स्मृति की चादर

मधु ने बहुत ही संघर्षों में अपनी इकलौती बेटी को पढ़ा लिखा कर सक्षम बनाया था। पति की कैंसर की बीमारी ने लगभग सारी जमा पूंजी खर्च करवा दी थी और परिवार उन्हें चाह कर भी बचा नहीं पाया था। मधु खुद भी शुरु से नौकरी पेशा थी, शहर के ही प्रतिष्ठित स्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी। उस समय उसकी बेटी नौवीं कक्षा में थी जब बाप का साया सिर से उठ गया था। मधु को खुद को संभालने में वर्षों लग गए थे। वो तो मायके वालों का नैतिक समर्थन मिलता रहता था। आर्थिक मदद की पेशकश को तो मधु ने ठुकरा दिया था क्योंकि उसका मानना था कि अपनी चादर में हीपैर पसारने चाहिए। बेटी को भी अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा दिलवाई थी। एम.बी. ए. करने के तुरंत बाद ही अच्छी कम्पनी में मैनेजर के पद पर नौकरी भी मिल गई थी। बेटी, मेघा ने पहला तोफा मां को ही दिया था।

छ: महीने पश्चात मधु के भतीजे की शादी निश्चित हो गई थी । दिसम्बर का महीना था और सभी बहनें अपने बच्चों के साथ पहुंच चुकी थी। मधु की तीन बहनें व एक भाई था। मेघा मुम्बई से आई थी। सभी उसी का इंतजार कर रहे थे क्योंकि हर महफिल की वह जान होती थी। चेहरे पर हर वक्त मुस्कान लिए सभी के दिलों को जीत लिया था उसने। मेघा को लिवाने स्वयं उसका मामा गया था। शाम के समय सब इक्ठ्ठा बैठे थे तो मधु ने अपना सूटकेस खोला और सबसे पहले अपनी नानी को उपहार स्वरूप शाल दिया और फिर बड़ी मौसी, छोटी मौसी,मामा, मामी, सभी कज़न और दुल्हे के लिए खास तोफा। एक के बाद एक उपहार उसके पिटारे में से निकलते जा रहे थे। एक पूरी तंख्वाह मेघा ने बहुत सलीके से चुने हुए उपहार पर खर्च कर दी थी। मधु के लिए भी बढिया साड़ी और महंगा पर्स लेकर आयी थी। मामा सभी बच्चों का प्रिय मामा था। नाना तो बहुत साल पहले गुज़र गए थे लेकिन उनके बताए रास्ते को अपना कर सभी बच्चे उन्हें याद करते थे। नानी ने तो उसी दिन कहा था, ” मेघा जितना बड़ा दिल किसी का नहीं है”। उस दिन के बाद सभी मेघा को सैंटा ही बुलाते थे। बेटे की शादी के बाद, विदा होते वक्त मेघा के मामा ने भी उसे खास उपहार दिया था। मैं और मधु तो खास सहेली होने के नाते एक दूसरे के मायके में विवाह समारोह आदि में एक बेटी की हैसियत से ही जाते रहते हैं।

मधु के लिए तो वह हमेशा सैंटा ही बनी रही। जब से नौकरी लगी है बेटी मेघा की लायी हुई साड़ी, पर्स और पेन इस्तेमाल करती आई है। छोटी छोटी चीज़ें जो कभी मधु को आकर्षित करती थी सब घर में लाकर सज़ा दी।घर का कोई कोना ऐसा नहीं था जहां मेघा द्वारा लाई गई वस्तुएं ना हो। मधु अब लगभग साठ वर्ष की हो गई है लेकिन बेटी के उपहार लाने का सिलसिला निरंतर जारी है। ऐसा नहीं है कि मधु उसके लिए कुछ नहीं लाती। जब भी जरूरत होती है वह उसे देती रहती है, खासकर मधु को सोने में निवेश करना ठीक लगता है क्योंकि ये औरतों के लिए गहना भी रहता है और आड़े वक्त में काम भी आ जाता है।…

दो साल पहले मधु की भानज़ी की शादी थी, डेस्टिनेशन वेडिंग थी। मधु तो जाने में हिचक रही थी कि शादी के हिसाब से कपड़े भी बढ़िया होने चाहिए और वह ज्यादा खर्च करना नहीं चाहती थी। तब बेटी मेघा दिल्ली आ चुकी थी और मधु को अपने साथ मॉल में लेकर गई और पंसदीदा प्लोज़ो सूट व सरारा आदि दिलवाया। मेंहदी के वक्त पहनने के लिए धोती सलवार । सब दिलवाने के बाद कहती है,” अब मैं सन्तुष्ट हूँ कि आपकी शोपिंग हो गई”। मधु तो मेरी खास सहेली है और हमारे घर भी पास पास हैं तो हम लगभग हर रोज़ सैर के समय मिल लेतें हैं…।

मेघा को कम्पनी की तरफ से एक सप्ताह के लिए चीन जाने का अवसर मिला तो मधु थोड़ा घबराई हुई थी लेकिन हम सबने कहा कि आज़कल बच्चे बाहर जाते रहते हैं तो घबराओ नहीं। एक सप्ताह बाद लौटी तो चीन से भी काफी उपहार मधु और नानी के लिए लाई थी। मधु बताती है कि ” मेघा, नानी को कभी नहीं भूलती।”। चूंकि मेघा की नानी पूजा पाठ करती है तो उनके मंदिर के लिए घंटी, दीपक और अलग अलग खशबू की अग़रबती इत्यादि लाती रहती है। यूं तो नानी के लिए सभी बहनों के बच्चे कुछ ना कुछ लाते रहते हैं लेकिन मेघा की तो बात ही अलग है। बचपन में छ महीने नानी की गोद में पली थी चूंकि उस वक्त मेघा दूसरे राज्य में नौकरी करती थी। शायद वही जुड़ाव है नानी और दोहती का। पति की बिमारी की वज़ह से मधु ने सरकारी नौकरी छोड़कर उसी शहर में एक नामी स्कूल में ज्वाइन कर लिया था और पति की खूब सेवा की थी लेकिन जिंदगी में मधु और बेटी को छोड़कर वे परलोक सिधार गए थे और मधु अपने में ही सिमटकर रह गई थी। लेकिन अब मेघा हर खुशी अपनी मां के चरणों में डाल देना चाहती है।..

पिछले क्रिसमस पर तो मेघा अपनी सहेली के साथ राजस्थान में निमराना गई थी और बेडशीट, कम्फर्टर, कढ़ाई वाली जूतीयां, हैंडबैग आदी आदी। उस वक्त मैं भी मधु के घर ही बैठी थी तो एक वॉल हेंगिंग मुझे भी दिया और फिर अपनी मां को एक एक चीज़ बहुत उत्साहित होकर दे रही थी। सब वस्तुओं को देने के बाद कहती है,” मम्मा और कुछ चाहिए , आज़ आपका सांटा आया है”। उस वक्त मेघा को आशीर्वाद देते हुए मैं अपने घर लौट आई और सोचती रही “काश मेरी भी बेटी होती, जो अपनी मां के ऐसे ही सैंटा बनती”।

✍️©®”जोया” 25/12/2018

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