अल्फाज़ों की सिसकियां

जनवरी माह की की कड़कड़ाती ठंड। सुधा अपने दोनों बच्चों के साथ रज़ाई की गरमाहट में महफूज थी कि रात के लगभग दो बज़े फोन की घंटी बज उठती है। दूसरी तरफ से किसी अनज़ान आवाज़ को सुनकर वह सकते में आ गई।” मैडम मैं रोहित, रामनगर से बात कर रहा हूं। क्या आप श्रीमती सुधा शर्मा हैं?””हां, हां मैं सुधा ही बोल रही हूं। आप कौन हैं और फोन क्यों कर रहे हैं इस वक्त?”सुधा बहुत ही सख्त मिज़ाज औरत थी। खासकर अनजाने कॉल पर तो उनका पारा सातवें आसमान पर होता था। उधर से फिर आवाज़ आई, ” मैडम, क्या विपुल शर्मा ही आपके पति हैं?””हां, लेकिन आप क्यों रात में इस तरह के सवाल कर रहे हैं?”” मैडम, मैं रामनगर का ही रहने वाला हूं और किसी कारणवश आज़ मुझे जल्दी अपने घर पर पहुंचने में देर हो गई””तुम मुझे क्यों परेशान कर रहे हो इस वक्त?””मैडम, थोड़ा दिल मज़बूत कर लें, क्योंकि जो खबर मुझे सुनानी पड़ रही है वह बहुत दर्दनाक हादसे की है”सुधा को ध्यान आया विपुल को भी तो आज़ रामनगर ही जाना था। लेकिन क्यों बुरा सोचा जाए, इसी ऊहापोह में थी कि फिर वही आवाज़ आती है।” सुधा जी मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आपके पति विपुल भयानक कार दुर्घटना में चल बसे हैं”।
सुधा को अभी भी अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था और वह प्रार्थना की मुद्रा में बैठी रही और भगवान से विपुल की सलामती की पुकार कर रही थी, एक उम्मीद की किरण लिए कि कहीं कुछ गलतफहमी रही हो इस खबर में। दूसरे कमरे में सोये सास ससुर को भी अभी नहीं बताया गया था कि चालीस साल के जवान बेटे की खबर उनके बुढापे में दुखों का पहाड़ बनकर टूटेगी। विपुल के साथी रोहित, रामनगर रहते थे। सुधा के पास आधे घंटे बाद फिर फोन आया। इस बार विपुल के दोस्त की आवाज़ थी जिनको दुर्घटना स्थल पर बुला लिया गया था। एंम्बुलेंस विपुल को सिविल अस्पताल ले जा चुकी थी।
“भाभी मैं, रोहित बोल रहा हूं। आप हिम्मत रखें लेकिन ये सच है कि विपुल हमें बीच राह में छोड़ कर जा चुका है” रोहित का गला रूंध चुका था। इधर सुधा की हालत खराब थी।कहीं बच्चे ना जाग जाएं वह उठकर दूसरे कमरे में आ चली गई और उसकी सिसकयों में उसे दम घुटता महसूस हो रहा था। अभी रात्री के तीन बजे थे सास ससुर को भी नहीं उठाना चाह रही थी, यही सोचकर कि उनपर क्या बीतेगी। फिर उठी और फोन पर अपने भाई को इतला देकर फफक फफककर रोने लगी, लगभग अर्द्ध मूर्च्छित अवस्था में थी। तभी भाई ने उसके पडो़स में फोन किया और दरवाज़े पर जोर जोर की खट खट से सास ससुर भी उठ गए क्योंकि इस पीड़ाजनक हादसे की जानकारी उनको सुधा के भाई ने दे दी थी। सुधा की हालत काफी खराब थी, बार बार सिसकयां उसका दम घोंट रही थी। घर में मचे कोहराम से बच्चे भी उठ चुके थे। तब तक दूसरे पड़ोसी भी पहुंच गए थे और सब को ढाढ़स बंधा रहे थे। सुधा के देवर , देवरानी दिल्ली से चल चुके थे उधर भाई व माता पिता हिसार से चल चुके थे। सुधा रोहतक रहती थी। रामनगर से विपुल के पार्थिव देह को लेकर रामनगर के साथी चल चुके थे।
विपुल का काफी अच्छा कारोबार था। सात- आठ बड़े ट्रालों का मालढुलाई का कारोबार। इन पांच छ: सालों में ही तो व्यापार में बहुत पैसा कमाया था विपुल ने। उससे पहले तो काफी कठिन समय भी निकला था। सुधा स्वंय भी अच्छे पद पर बैंक में नौकरी करती थी तो कठिन दौर को भी निकाल लिया था। पिछले पांच सालों में तो लक्ष्मी ने छप्पर फाड़ कर दिया था और विपुल अपने बच्चों के बहुत लाड़ करते थे बल्कि सुधा की माने तो “बिगाड़” दिया था। तीन साल में तीन नयी गाड़ियां घर में सबके लिए लाकर रख दी थीं। सुधा को कहते थे ” बिल्कुल फिकर ना करो। मेरे बच्चे नवाब की तरहं पलेंगे”। सुधा जमीन से जुड़ी महिला थी और वह कहती थी, ” सपने ऊचें लो लेकिन पैर जमीन पर ही टिके रहने चाहिएं”। सुधा बहुत व्यवाहरिक महिला थी। संघर्ष का दौर देखा था। विपुल खुशमिजाज़ व मस्त किस्म का बन्दा था।
दुनिया के लिए तो सूरज़ उग गया था लेकिन सुधा के लिए आज़ ये अंधेरा ही लेकर आया था। दोपहर तक विपुल का पार्थिव शरीर घर के आंगन से अंतिम विदाई के लिए पंहुच चुका था। तब तक खबर शहर में आग की तरह फैल गई थी। विपुल बहुत मिलनसार थे। स्थानीय राजनीति के लोगों से भी खासा जान पहचान थी। घर के आंगन में पैर रखने की जगह नहीं थी। सुधा का रो रोकर बुरा हाल था। ससुर भी बार बार आकर बहू को सांत्वना दे रहे थे यद्धपि उनका दुख कुछ कम नहीं था। सबके रिश्ते अपनी जगह थे। सुधा के बच्चे नौ व तेरह साल की उम्र में भी मां का संबल बन रहे थे। इतनी छोटी उम्र में भी उन्होंने स्वयं को मां के सामने कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। अब सुधा ही उनकी मां थी और पापा भी।
सांयकाल पांच बज़े अंतिम संस्कार कर दिया गया। सुधा की बड़ी बहन वहीं रुक गई थी क्योंकि सुधा को परिवार के सहारे की जरुरत थी। देवरानी सारे व्यवसाय से संबंधित कागजात को इकठ्ठा कर रही थी। सुधा की हिम्मत नहीं थी कुछ भी देखने की। उसके आंसू अविरल बहते जा रहे थे। तेरह दिन तक ढाढ़स बंधाने वालों का आना जाना लगा रहा। तेरवहीं के पश्चात ही परिवार की परीक्षा होती है, एक वैधव्य से पीड़ित पत्नी के लिए आगे का सफ़र कठिन होता है…।
विपुल ने एक कम्पनी बना कर अपना व्यवसाय शुरू किया था जिसमें माता पिता, देवर देवरानी, पत्नी और एक दो दोस्तों को मिलाकर बनायी थी। जहाँ पैसा अधिक हो जाता है वहां पर झगड़े प्रोपर्टी को लेकर होना लाजिमी है। कुछ समझदार लोगों को छोड़कर जिन्हें परिवार को बांधना आता है। सुधा के अनुसार पैसा विपुल ने लगाया था, बैंक लोन वगैरा था जो उसने ही चुकता किया था अब लेकिन दावेदार सभी हो गए, दोस्तों को छोड़कर। देवर, देवरानी से सुधा के रिश्ते अब तल्खी भरे हो गए। सास ससुर को भी बेटे के जाने का दुख कम और पैसे पर निगाह ज्यादा थी। बहुत बार मुझे आभास होता है कि शादी करने के बाद लड़के भी मां बाप के लिए पराये हो जाते हैं उस वक्त खासकर जब उन पर कोई तकलीफ आ जाए और ऐसे हादसों में तो वैधव्य झेल रही पत्नी जैसे दुश्मन दिखाई देती है। उसके दिल पर क्या गुज़रती है परिवार वाले तो समझने को तैयार नहीं।
सुधा के साथ भी ऐसा ही हुआ और सारी प्रोपर्टी के बराबर हिस्से हो गए। रिश्तों में कड़वाहट इस कदर थी कि सुधा अपने बच्चों को लेकर दूसरे शहर चली गई और बड़ी बहन की मदद से एक प्लाट भी खरीद लिया। पैसे की दिक्कत नहीं थी लेकिन सही जगह दिलवाने के लिए भागदौड़ करने वाला भी तो हो। विपुल जीवित थे तो हमेशा सुधा को गाड़ी में भेजते थे कार्यस्थल पर लेकिन सुधा को गुरूग्राम जैसे शहर में मकान भी बनाना था तो गाड़ी का कुछ साल के लिए इस्तेमाल बंद कर दिया। बच्चे अभी छोटे थे। समय बीतता गया…और दोनों बच्चों की शिक्षा दिक्षा पूरी करके खूब अच्छी शादियां की लेकिन हर एक क्षण पति विपुल की यादें सुधा के साथ रहती थी। बेटी की विदाई के भावुक क्षणों में सुधा की आंखें सज़ल हो गई और अल्फाज़ों की सिसकयां जारी रही।
✍️©®”जोया”21/12/2018

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