सज़ा

शुभा बहुत ही नेकदिल व संवेदनशील महिला। बचपन से ही अनुशासन उसके जीवन का अभिन्न अंग रहा। अपनी हर भावना को भी उसने अनुशासित कर रखा था। बीस साल की उम्र में शादी के बंधन में बंधकर सुसराल मे सभी जिम्मेदारी निभाती रही। अतिक्रोधी पति ने उसके कोमल मन व भावनाओं को तार तार कर दिया था। फिर भी आर्दश पत्नी की तरह घर और बाहर हर कार्य को सलीके से करती रही। दो सुंदर बच्चों के आने पर तो उसका जीवन उनके पालनपोषण मे व्यस्त हो गया और पति के क्रोध को नजरअंदाज करने लगी।

लेकिन एक संवेदनशील महिला के अंतर्मन पर गहरे जख्म बनते चले गए। पति के प्रति प्रगाढ़ प्रेम होते हुए भी किसी न किसी क्षण वह कमजोर पड़ जाती थी और फिर वह अपने उस पहले प्यार की यादों में डूब जाती थी। छात्रावास में 24/7 का साथ था अनूप के साथ। बोर्डिंग स्कूल में दोनों का बारह वर्षों का साथ था और दोनों ही स्कूल कप्तान रहे। सभी के चेहते कब एक दूसरे के करीब आए उसका अहसास बिछुड़ते वक्त हुआ। दोनों का मूक प्रेम हृदय की गहराई तक पैठ बना चुका था।1980 के दशक में आम घरों में प्रेम एक गुनाह की तरह देखा जाता था।फलतः दोनों ने अपने प्रेम को माता पिता की आज्ञा के सामने झुका दिया। लेकिन क्या वास्तव में झुक पाए। नहीं।

हर क्षण ये प्रेम प्रगाढ़ होता चला गया। जीवन चलता रहा और बीस साल के अंतराल पर पूर्व छात्र मिलन समोरह में शुभा पुराने साथियों से मिली तो अनूप का पता मिला जो फौज मे कर्नल के पद पर कार्यरत था। पत्र व्यवहार शुरू हुआ। शुभा ने पति से इजाजत ले ली थी। उधर अनूप ने पत्नी को भी विश्वास में लिया था।दोनों परिवार एक दूसरे से मिले भी। जीवन में खुशियां शुभा के लिए लौट आयी थी। वो खुशी जो उसके पोर पोर को आंनद से सरोबार कर गई थी।

शुभा कालेज़ में प्रोफेसर पद पर नियुक्त थी। उसने सब बातें अपनी खास़ सहेली शिखा से सांझा की। इन दोनों परिवारों का भी काफी आना जाना था। ऊषा के पति शुभा को पसंद करते थे। शिखा हंसी मज़ाक में सब बताती थी कि कैसे उसके पति अजय शुभा पर फि़दा हैं। शुभा सब बातें हंसी में टाल देती थी। क्योंकि बातें हंसी ठिठोली तक सीमित थीऔर दोनों सहेलियां अपनी अपनी गृहस्थी में स्थापित होकर अपने जीवनसाथीयों का विश्वास हासिल कर चुकी थी। दोनों अपने युवावस्था के किस्से साझां करके मस्त रहतीं थी। शुभा का हृदय तो अपने पहले प्यार अनूप के लिए धड़क रहा था। लेकिन यह भी बस हंसी मजाक तक ही सीमित था। शुभा की प्रेम से परिपूर्ण मन की जानकारी शिखा के पति को थी और उसने योज़ना बनाई कि किस तरह वह शुभा की उस वक्त की भावनात्मक कमजोरी का फायदा उठाया जाए। एक दिन अजय शुभा के घर आए जब शुभा के पति दूसरे शहर अपनी डयूटी पर जा चुके थे और बच्चे स्कूल। शुभा ने उस दिन छुट्टी ले रखी थी। ये बात अजय को शिखा से पता लग गई थी। शुभा चाय बना कर लाई। दोनों हंसी मजाक कर रहे थे और अनूप को लेकर भी बातें चर्चा में थी। शुभा की भावनात्मक कमजोरी का फायदा उठा कर अजय ने बाहुपोश में भरकर अपनी मर्दाना छाप छोड़नी चाही जिसका शुभा ने विरोध किया और शिखा को बताने की धमकी दी। अजय क्षमा याचना करने लगा और कहा आंइदा ऐसी कोई हरकत नहीं होगी। शुभा ने उसे माफ़ कर दिया ये सोचकर की क्यों बात को बढ़ाया जाए और वह शिखा की गृहस्थी में भी कोई विवाद नहीं पैदा करना चाहती थी और ना ही अपनी गृहस्थी में। एक मानवीय भूल समझ कर अजय को माफ़ कर दिया था।

लेकिन शुभा के लिए ये घटना अपराध बोध की ग्लानि बन गई थी और वह अपना मानसिक संतुलन उस वक्त खो बैठी जब शिखा ने कहा कि ” अजय कह रहा था कि तुम सन्तुष्ट नहीं हो और इसलिए अनूप से संपर्क बनाए रखना चाहती हो”। शुभा के लिए ये कटाक्ष बहुत भारी था क्योंकि अजय ने जो कुछ किया उसका जिक्र वह किसी से कर नहीं सकती थी। सहेली का पति होने के नाते चुप रहना ही ठीक समझा। आखिर गलत उसी को समझा जाता। फिर वह यह भी समझती थी कि क्षणिक कमजोरी किसी से भी गलत कदम उठवा सकती है। बात है कि उसे दुबारा न दोराहा जाए। अजय क्षमा मांगकर गया था कि फिर कभी ऐसा नहीं होगा।

शुभा ने हृदय से क्षमा किया लेकिन वही अजय उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा था। अपराध बोध से ग्रसित, मानसिक तनाव और किसी से भी साझा नहीं कर पाने से शुभा दो महीनों तक बिस्तर में पागलों की हालत में पड़ी रही। दवा भी काम नहीं कर रही थी क्योंकि डाक्टर को असली ज़ड बताये तभी तो सटीक इलाज हो। पति को देखते ही भयभीत हो जाती थी कि इनको पता लग गया तो क्या होगा। अपने में घुटती रही। ईलाज़ से ज्यादा फायदा नहीं हो रहा था। क्रोधी पति शुभा की बिमारी से परेशान होकर उसे इस विक्षिप्त हालत में भी बुरी तरह पीटते थे जिसका परिणाम ये हुआ कि शुभा की बीमारी और बढ़ गई। पति ने परिवार के दवाब में आकर तलाक की अर्जी लगा दी थी। शुभा की मानसिक हालत को तलाक का आधार बनाया गया था। शुभा की सास की तो शुरु से ही नज़र थी कि बेटे की आमदनी उसे मिलेगी अब।आग में घी डालने का काम शिखा ने किया, जो कालेज़ में शुभा की प्रतिष्ठा से मन ही मन शायद द्वेष रखने लग गई थी। उसने शुभा के पहले प्यार के प्रति सुंदर भावनाओं को खूब बढा़ चढा़ कर शुभा के पति और सुसराल वालों के सामने पेश किया। शुभा और अनूप के रूहानी रिश्ते को अपनी संकीर्ण मानसिकता के अनुसार देखा।

शुभा ने फिर बीमार अवस्था में ही सब जिम्मेदारी सम्भाली क्योंकि उसे दो मासूम बच्चों के भविष्य की चिंता थी।…कठिन समय में कोई किसी का नहीं होता।…घटनाक्रम ने शुभा के जीवन के पूरे अठारह साल लील लिए। जिंदगी फिर पटरी पर लौटी । शुभा के दोनों बच्चे बड़े पदों पर आसीन हो गए। सारा बोझ अपने अकेले कंधों पर ढो़ती हुई शुभा भी पहले से ज्यादा मजबूत होकर निखरी है।

शुभा ठीक होने के बाद मुझ से वार्तालाप में कहती है कि लोग हर रोज़ पता नहीं कितने गुनाह करते हैं। दूसरे लोगों से शारिरिक संबंध भी बनाते हैं। समाज़ में लेकिन सफेदपोश बनकर रहते हैं। और यहां क्षणिक कमज़ोरी की इतनी बड़ी सज़ा उसे मिली। उसकी बात ने मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया कि हर व्यक्ति कभी न कभी इस तरह की गलती कर बैठता है लेकिन जब तक किसी को पता नहीं चलता तो वह पाक साफ है और दूसरों पर वाणी के तीर चलाता है और निर्णायक की भूमिका निभाता है।

✍️© ®”जोया”१५/११/२०१८

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