जिद्द

फरवरी माह 1998 की एक शाम सुकृति अपनी डयूटी से घर लौटती है और पति के आने के इंतज़ार में शाम की चाय की तैयारी शुरू करती है।शाम से रात हो जाती है लेकिन पति राजीव का कोई अता पता नहीं चलता।किसी अनहोनी की आंशका से वह कांप उठती है। रात 11 बजे फोन की घंटी बजती है और एक सख्त आवाज का संदेश आता है कि आपके पति को उसके वसूलों की सज़ा हमने दे दी है। राजीव बहुत मिलनसार व्यक्ति थे और सुकृति को समझ नहीं आया कि मामला क्या है।सुकृति ने सुसराल वालों से सम्पर्क किया और इस घटनाक्रम के बारे मे बताया।सुकृति और राजीव बच्चों के साथ शहर में रहते थे और सास ससुर दूसरे बेटे के साथ गांव की जमीन जायदाद सम्भालते थे। सुकृति के बच्चे उस वक्त पांचवी और सातवीं कक्षा में पढते थे। राजीव से कोई सम्पर्क नहीं स्थापित हो रहा था। सुकृति की हालत बहुत खराब हो गई थी क्योंकि वह कुछ दिन पहले ही अवसाद से बाहर आयी थी। घरवालों ने चारों तरफ राजीव को ढूंढने के लिए अलग अलग स्थानों पर रिश्तेदारों को भेजा लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

राजीव एक सप्ताह बाद गंगा नदी के किनारे देवप्रयाग में मिल तो गए लेकिन मानसिक संतुलन खो चुके थे।एक सप्ताह के अन्दर ही उनकी आंखों की रोशनी काफी कम हो गई थी और शरीर पर चोट के गहरे निशान थे।वे इस हालत में नहीं थे कि बता सकें कि उनकी इस प्रकार से हालत किसने की।वे खामोश हो चुके थे। घर वाले राजीव को सुकृति को सौप कर गांव वापिस लौट जाते हैं। सुकृति के भाई ने उनका मानसिक चिकित्सा करवाई लेकिन वे कभी पूर्ण रूप से ठीक नहीं हो पाये। नौकरी से त्याग पत्र दे दिया गया क्योंकि नौकरी के नाम से ही उन्हें घबराहट होती थी। बना बनाया महल ताश के पतों की तरह ढह गया। सुकृति भी गहरे अवसाद में फिर वापिस चली गई। लेकिन वह अपनी दवाओं के सहारे अपनी नौकरी पर जाती रही क्योंकि उसने ये जिद ठान ली थी सब कुछ फिर से खडा़ करना है।

जैसे संसार में होता है कष्टों में कोई आपका साथ नहीं देता है सब रिश्तेदार धीरे धीरे दूर होते चले गए। राजीव बहुत ही हिंसात्मक हो चले गए थे और सुकृति और बच्चों पर अपना गुस्सा निकालते थे। कभी कभी बिल्कुल खामोश हो जाते। एक मानसिक रुप से बिमार व्यक्ति को सम्भालना अपने आप मे बहुत बडी चुनौती होती है।और अकेली औरत को सबकुछ सम्भालना पड़े तब डगर और भी कठिन हो जाती है। सुकृति के लिये ये सब किसी युद्ध से कम नहीं था। पांच बार तो बिजली के झटके दिए गये। डाक्टरों का मानना था कि ऐसे मरीज मुश्किल ही बच पातें हैं क्योंकि सुसाइड की आंशका बनी रहती है।बच्चों को स्कूल भेजने के बाद सुकृति अपने पति को दवाई देकर अपनी नौकरी पर चली जाती। राजीव के माता पिता भी एक महीना ठहरने के बाद गांव चले गए।

सुकृति को कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा था लेकिन मां बाप के दिए हुए संस्कारों की वजह से वह गृहस्थी की गाड़ी को एक पहिए से खींचने लगी। इस कष्ट के समय मे उसके बच्चों ने भी हौंसला नहीं खोया और लगन से हर कक्षा मे बेहतर प्रदर्शन करते रहे। इस घटनाक्रम में कब सुकृति के गहरे काले बाल बुढापे की झलक लिए दस्तक देने लगे पता ही नहीं चला। बीस साल तक जूझने के बाद सुकृति आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है क्योंकि उसकी मेहनत सफल हुई थी और राजीव काफी हद तक ठीक हो चले थे यद्यपि पूर्ण रूप से ठीक होंगे इसकी आशंका बनी रहती है।

आज़ सुकृति के बच्चे सुन्दर युवा बन चुके हैं और अच्छे पदों पर आसीन हैं। जो रिश्तेदार और राजीव के दोस्त दूर हो चुके थे वे अब फिर से आने लगें हैं लेकिन अब राजीव एक औपचारिकता भर निभाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कष्ट में सुकृति की बहनों और मायके वालों ने ही हौंसला अफजाई की थी। लेकिन फिर भी सुकृति ने किसी से भी एक पैसे की मदद नही ली क्योंकि उसका भगवान हर क्षण उसके साथ खडा़ था। और ये भगवान और कोई नही उसकी हिम्मत थी, उसकी जिद थी ।कहा भी जाता है कि भगवान उसकी मदद करते हैं जो अपनी मदद खुद करतें हैं। युद्ध हम केवल सरहदों पर ही नहीं करते , गृहस्थ जीवन भी मनुष्य के जीवट को अपनी कसोटी पर आंकता रहता है।

✍️©®”जोया” 20/09/2018

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s