भंवर

दीपा – हां यही तो नाम था उसका।

दीपा मेरे पड़ोस में रहने वाली बहुत ही सुशील और नेकदिल लड़की। नाम के अनुरूप हमेशा जीवन रोशनी से भरपूर। कालेज हम साथ ही जाते थे। वह अपने माता पिता की इकलौती सन्तान बड़ी नाज़ से पली पढ़ी थी। संगीत, चित्रकारी और साहित्यिक कृतियों में उसका गुण निखर कर झलकता था। शिक्षा दिक्षा पूरी होने के बाद हमारे रास्ते अलग हो गए। उसकी शादी सेना में मेज़र से तय हो गई थी और मैं भी शादी के बाद अपनी घर गृहस्थी मे व्यस्त हो गई। पत्राचार हमारे बीच काफी साल जारी रहा फिर धीरे धीरे वह भी कम हो गया।
समय पंख लगा कर उड़ रहा था। बच्चे बड़े होकर शादी शुदा जिंदगी में जम गए थे। पति भी रिटायर हो गए थे। मैं स्वयं भी बैंक अधिकारी के पद से रिटायर हो गई थी। अब मेरे पास काफी समय था और मैं एक स्ंस्था हुनरमंद से जुड़ गई जहां कम पढ़ीलिखी महिलाओं को उनके हुनर के हिसाब से आत्मनिर्भर बनाने में सहायता की जाती थी। बैंक में कार्य करने का मेरा अनुभव काफी काम आया और लोन वगैरा दिलवाने में मैं इन सब औरतों की मदद करती थी। धीरे धीरे मेरी जान पहचान औरतों के हक में आवाज़ बुलंद करने वाली संस्थाओं बढ़ गई थी।

एक दिन हुनरमंद संस्था का वार्षिक उत्सव मनाया जा रहा था तब कार्यक्रम के बीच में मुख्य अतिथि के पास एक महिला आकर बैठ गई। क्योंकि कार्यक्रम संयोजक का जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई थी तो मैं स्टेज़ के पास ही खड़ी थी। मेरी नज़र बार बार इस महिला पर केंद्रित हो रही थी। कुछ जानी पहचानी सूरत। चाय पान के समय हम दोनों एक दूसरे को पहचान की कोशिश कर रही थीं। अचानक दोनो ने एकसाथ बोला”संजना‘ ‘दीपाऔर हम यादों में खो गए। दीपा जीवन के दौर में महिला सशक्तीकरण संस्था से जुड़ी थी।

घर आने का न्यौता देकर दीपा चली गई। एक सप्ताह बाद ही उसका फोन आया और हम दोनों सहेलियां जीवन के मुख्य पलों को सांझा कर रही थी। दीपा ने बताया कि वह पति से अलग रह रही है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि शादी को दो ही साल हुए थे जब उसके पति का प्रमोशन होना था। उनके घर पर बड़े अफ़सर सौरभ के साथ डिनर चल रहा था और बढिय़ा वाइन तो फौजी घरों में आम बात थी। हंसी मज़ाक का दौर चल रहा था। दीपा भी वाइन लेती थी क्योंकि ये बहुत आम बात थी उस परिवेश में। उस दिन सभी ने कुछ ज्यादा ही ले ली थी और रात के एक बज़ गए थे। दीपा के पति अजय ने सौरभ को वहीं रूकने के लिए कहा। दीपा ने बताया कि वाइन का आखिरी पैग पीने के बाद उसे कुछ नशा ज्यादा हो गया था और सिर में थोड़े चक्कर महसूस कर रही थी, इसलिए वह अपने कमर मे जाकर सो गई।

दूसरे दिन सुबह नींद खुली तो अपने बिस्तर पर सौरभ को पाकर परेशान हो गई। और वह जोऱ से चीखने लगी। सौरभ की नींद भी खुल चुकी थी और वह मंद मंद मुसकरा रहा था।पति अजय सुबह की सैर के लिए निकल चुका था। सौरभ ने कहा ” आज़ रात को मुझे तृप्त करने के लिए शुक्रीया। तुम वाकई बहुत हसींन हो”। दीपा अपने को ठगा सा महसूस कर रही थी और रात की कुछ धुंधली यादें दिमाग़ में अक्स ले रही थी…और वह ग्लानि से भर चुकी थी। सौरभ जा चुका था और पति अजय घर में दाखिल हुए थे। दोनों के बीच खूब झगड़ा हुआ और अजय ने कहा ” क्या हुआ यदि मेरे प्रमोशन के लिए सौरभ को एक रात खुश कर दिया ?”

दीपा ने बताया कि उसी दिन वह अजय को छोड़कर चली आयी थी। जख्म गहरे थे। तलाक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसने अपने आप को इस संस्था के कार्य में झौंक दिया था। पैसे की दिक्कत नहीं थी। मां बाप ने उसे पूरा सहारा दिया था। अच्छे मनोचिकित्सक से उसका इलाज़ करवाया था। लेकिन दीपा ने बताया कि उसके साथ जो विश्वासघात हुआ उसके निशान इतने साल बाद भी अंकित हैं यद्यपि वह सब भूलना चाहती है पर कभी न कभी उसके मन मस्तिष्क पर सब कुछ छा जाता है और वह चीख चीख कर कहती हैमी टू

दीपा जैसी कहानी हमारे आसपास, हर गांव, कसबे, शहर व हर वर्ग में घटती रहती हैं लेकिन उन औरतों में अभी हौंसला नहीं है अपनी कहानी शेयर करने का, क्योंकिमी टू के भंवर में उलझकर गृहस्थी की नींव को हिलाना नहीं चाहती और दूसरा कारण ये भी हो सकता है कि अभी आत्मनिर्भर भी नहीं हैं जो इस भंवर में उलझें। तीसरा कारण ये भी है कि न्यायालय में फाइलों के अंबार पहले ही हैं और उन्हें नहीं लगता कि उनके जीते जी न्याय मिल जाए। फिर कोइ साक्ष्य थोड़े ही उन्होंने रखें होगें जो अब आवाज़ उठाएं। लेकिन जो लोग ये सोचते हैं कि उसी वक्त आवाज़ उठानी चाहिए थी तो मेरा मानना ये है की “ जो इन हादसों से गुज़रता है वही समझ सकता है कि अपराध बोध, ग्लानि, आत्मविश्वास की टूटन के भंवर से निकलने मे वर्षों लग सकते हैं।

एक फेसबुक पोस्ट मैं पढ़ रही थी। किसी ने लिखा था-
” काम निकलवाना हो तो ‘ Sweetu’ और काम निकल जाए तो ‘Me Too'”
मेरा सवाल ये है कि ” काम करने के लिए क्या पुरूष एक औरत की अस्मिता से खेलेंगे?”
विचारणीय प्रश्न है। सोचिए जरा।

✍️©️”जोया”14/10/2018.

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