हमनवां

सुशोभन व कीर्ति को सामायिक, सामाजिक और भूगौलिक दूरी भी कभी अलग नहीं कर पायी थी। युवाअवस्था की दहलीज पर आते आते उनका बचपन का प्यार परवान चढ़ गया था और दोनों की इश्क की कहानी हम जैसे साथियों के लिए मिशाल थी। हम सब साथी जानते थे कि वे दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं। सुशोभन और कीर्ति का प्रेम उनके रोम रोम में बसता था।लेकिन समस्या ये थी कि 1980 के दशक का भारतीय समाज़ और वह भी ग्रामीण क्षेत्र इश्क करने वालों के लिए म्यान से तलवार निकालने पर आमदा था। सुशोभन व कीर्ति की ज़ड़ें भी इसी ग्रामीण इलाकों से थी। पढ़ाई में अव्वल होने की वज़ह से पहली कक्षा से दोनों ने एक नामी विद्यालय में प्रवेश मिल गया था।24/7 का साथ, एक दूसरे को समझने के लिए बड़ा आधार था।

इश्क तो मानवीय संवेदना और अहसास पर टिका होता है। इश्क किया नहीं जाता, बस हो जाता है। मन तरंगों का अद्भुत मिलन लिए इश्क अपनी परकाष्ठा को प्राप्त करने को आतुर रहता है। कुछ ऐसा ही था मेरे दोनों दोस्तों का इश्क।कालेज़ भी हम सब ने साथ ही पूरा किया था।लेकिन इश्क में कठिनाई ना आएं ऐसा होता नहीं है। इन दोनों की इश्क की कहानी का भी एक विलेन था। वह और कोई नहीं बल्कि वह गुरू था जो हम सबको बहुत अच्छा लगता था। ये गुरू कीर्ति से शादी करना चाहता था क्योंकि बला की खूबसूरती बख्शी थी भगवान ने उसे और ऊपर से होशियार। लेकिन कीर्ति ने स्पष्ट मना कर दिया था और हम सब दोस्तों ने भी इन गुरु से दूरी बना ली थी। गुरु के अहम को चोट पंहुची थी। इसका परिणाम ये हुआ कि ये विलेन पंहुच गए कीर्ति के घर और सुशोभन व कीर्ति के प्रेम की बात बता दी। कीर्ति के पिता गुज़र चुके थे और कीर्ति का बड़ा भाई किसी भी प्रकार के सामाजिक अपमान का मुकाबला नहीं करना चाहता था। मां के कहने पर दूर की रिशतेदारी में शादी करके कीर्ति को विदा कर दिया गया।

शादी से पहले सुशोभन व कीर्ति आखरी बार मिले थे और दोनों ने साझा निर्णय लिया था कि माता पिता का कर्ज़ तो उतारना ही है और उस दिन हमनें दोनों को अलग अलग मुकाम की ओर भारी दिल व मुस्कराहट में भी पीड़ा लिए देखा था। उसके बाद वे कभी नहीं मिले। दोनों की अपनी अपनी गृहस्थी थी, पारिवारिक जिम्मेदारीयां थी, जिनको लक्ष्य बना कर वे अलग अलग डग़र चल पड़े थे और मैं, पंकज और दिशी- कीर्ति की खास सहेली, उन्हें चाह कर भी रोक नहीं पाए थे क्योंकि ये उनका निज़ी फैसला था।

ऐसा नहीं है कि वे एक दूसरे से संपर्क नहीं कर सकते थे । हम थे ना उनका संबल।लेकिन पारिवारिक कर्तव्यों की खातिर कभी उन्होंने मिलने की नहीं सोची। उन्हें अहसास था कि कम़जोर पड़ गए तो सम्भलना मुश्किल हो जाएगा। त्याग, करुणा व कर्त्तव्य बोध की जीती जागती मिशाल थे दोनों। आदर्शों को तो जैसे आत्मसात ही कर लिया था उन्होंने।

समय कब किसके लिए रूका है। इसके साथ कदम से कदम मिला कर जो लोग चल लेंते हैं तो अपनी मंजिल तक पहुंच जाते हैं नहीं तो संगी साथी भी छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं। ये तो हमारा आपसी तालमेल और स्नेह था कि व्यस्तता के बावजूद हम एकदूसरे के संपर्क में रहते थे। सुशोभन और कीर्ति के दूरभाष भी मैं, पंकज,और दिशी ही थे। जब भी हम कीर्ति से मिलते तो चर्चा का विषय घूमफिर कर सुशोभन पर टिक जाता था। हम दोनों महसूस कर पाते थे कि सुशोभन का जिक्र आते ही हृर्ष और पीडा़ मिश्रित भाव कीर्ति के चेहरे पर आ जाते थे और वह कुछ महीनों के लिए फिर से उर्जा से लबरेज़ हो जाती थी और अपनी पारिवारिक व कार्यस्थल की जिम्मेवारी को अच्छे से निभा पाती थी। ऐसे ही जब हम सुशोभन से मिलते तो कीर्ति की खुशहाली जानकर वह बहुत राहत महसूस करता था। उन दोनों के जीवनसाथी बहुत अच्छे थे लेकिन एक दूसरे को लेकर बहुत पोस्सीव थे । वे अच्छे हमसफ़र तो थे लेकिन हमनवां नहीं बन सके थे। किसी भी प्रकार का मसला ना हो इसलिए कभी सुशोभन व कीर्ति ने मिलने की नहीं सोची। मनतंरगो से तो दोनों जुड़े हुए थे।

समय बीता, हम सबके बच्चे बढिया तरहं से अपनी अपनी गृहस्थी में वयस्त हो गए। हम सब दोस्त भी रिटायर हो गए थे और अब स्वंय के लिए कुछ पल मिले थे भागमभाग जिन्दगी से। एकदिन दिशी के साथ काफ़ी पीते हुए हम दोनों ने योज़ना बनाई कि सुशोभन व कीर्ति की मुलाकात तो करवानी है क्योंकि हम समझ सकते थे कि इस संसार से विदा होने से पहले वे जरुर एक दूसरे का स्पर्श पाकर, अपने इश्क पर फिर से मुहर लगा देने में सुखद अनुभूति करेंगे। हमने योज़ना बनाई की दिशी के घर रात्रि भोज़ का आयोजन किया जाए। मैंनें और दिशी ने ये सुनिश्चित किया कि सुशोभन व कीर्ति अवश्य पंहुच जाएंं। साथ मे ये निर्णय भी किया कि अपने अपने जीवन साथी को बच्चों के पास भेज़ दिया जाए क्योंकि हम चारोंं अपने बचपन व जवानी के किस्सों को फिर से जी लेना चाहते थे। तारीख निश्चित हुई और मैं और दिशी वयस्त हो गए इस पल को यादगार बनाने में।

उस दिन दिशी ने रात्री के खाने की तैयारी के बाद अपनी कुक को भी घर भेज़ दिया था। हमने मिलकर एक कमरे को उनके अलग अलग समय के चित्रों को एक दिवार पर सुंदर कोलाज़ बना कर सज़ा दिया और मयूजिक सिस्टम में उनके पंसदीदा गाने सैट कर दिए। फिर मैं सुशोभन को लेने चला गया। वह रेलगाड़ी से पहुंच रहा था। दिशी ने एयरपोर्ट से कीर्ति को रिसीव किया।

मैं सुशोभन को लेकर आ रहा था कि मेरे मोबाइल पर घंटी बजी, राहत की सांस ली जब दिशी ने बताया कि कीर्ति पहुंच चुकी है। मैंने भी कहा हम अभी दस मिनट में पहुंच जाएंगे।
डोरबल बजी तो दिशी सुशोभन का स्वागत करने के लिए बाहर आई और हम सब लिविंग रूम में पहुंच गए। दिशी ने तुरंत ही मयूजिक सिस्टम से उनका पंसदीदा गाना लगा दिया था। फिर मैं और दिशी डाइनिंग रुम में चले गए थे, टेबल को सजा़ने के लिए। माहौल रोमानी हो चुका था। कीर्ति और सुशोभन एक दूसरे को देखकर आश्चर्य मिश्रित खुशी व पीडा़ से एक टक देखते रहे और फिर दूसरे ही पल एक दूसरे के बाहुपाश में बंध चुके थे। साठ साल की उम्र में उनका मिलन युवा प्रेमियों जैसा जोश लिए था और दोनों के नयनों से अवरिल अश्रुधारा बह निकली थी। मैं और दिशी दोनों के मिलन को अपने आंखों के कैमरे से रिकॉर्ड कर रहे थे और सुखद अनुभव से सरोबार हो गए।

अपनी कहानी को मैं अपर्णा की पंक्तियों से सज़ाना चाहूंगी। आशा है अपर्णा जी इजाजत देंगी।
” मिलकर भी ना मिले, प्रेम पूरा हो गया। एक के बगैर दूसरे का नाम अधूरा रह गया”।

✍️©”जोया”30/11/2018

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