करवट लेती जिन्दगी

गमों की सौगात दे गया था वो
चट्टान बन लेकिन डटी थी वो।

विश्वास हुआ था घायल
बजना भूल गई थी पायल।

वाणी के तीर चला
बढ़ा गया था पीर, दिखने में भला।

सांसो की धुन पर रचे थे, प्रेम गीत अनेक
बन मर्यादा पुरुषोत्तम, फिर भूल गया था वादा प्रत्येक।

चक्रव्यूह में फंसा गया
कायर था, वो फिर कहीं दुबक गया।

उसने माना था उसे, नाज़ुक कली
समेट कर अपनी अद्भुत क्षमता, खड़ी वो हो चली।

निकले थे, लोगों के तरकश से तीर
सामना किया उसने हो धीर अधीर।

इंसानों की बस्ती में, समझी ना किसी ने नारी पीड़
गिद्धों की तरह डाला डाका सबने उसके नीड़।

पाषाण हृदय वह बन चुकी थी, लिए हृदय में शूल
पल में छलकने वालीअश्रुधारा, अब रास्ता गई थी भूल।

वक्त कब किसके लिए ठहरा है, चलता रहा अपनी चाल
वह भी कब हार मानने वाली थी, उठा ली ढाल और तलवार।

जिन्दगी ने जो सबक सिखाया, किया उसने आत्मसात
भावनाओं पर था अब उसका नियंत्रण, फिर कभी ना हुई आंखों से बरसात।

जिन्दगी ने ली करवट हसीं
उम्मीदों की बस्तीयां बसी।

खिला कर फूल अपने बागवां
दिल खोलकर फिर वह हँसी, लहराती हँसी।

✍️©” जोया” 03/12/2018.

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