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स्मृति की चादर

मधु ने बहुत ही संघर्षों में अपनी इकलौती बेटी को पढ़ा लिखा कर सक्षम बनाया था। पति की कैंसर की बीमारी ने लगभग सारी जमा पूंजी खर्च करवा दी थी और परिवार उन्हें चाह कर भी बचा नहीं पाया था। मधु खुद भी शुरु से नौकरी पेशा थी, शहर के ही प्रतिष्ठित स्कूल में अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी। उस समय उसकी बेटी नौवीं कक्षा में थी जब बाप का साया सिर से उठ गया था। मधु को खुद को संभालने में वर्षों लग गए थे। वो तो मायके वालों का नैतिक समर्थन मिलता रहता था। आर्थिक मदद की पेशकश को तो मधु ने ठुकरा दिया था क्योंकि उसका मानना था कि अपनी चादर में हीपैर पसारने चाहिए। बेटी को भी अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा दिलवाई थी। एम.बी. ए. करने के तुरंत बाद ही अच्छी कम्पनी में मैनेजर के पद पर नौकरी भी मिल गई थी। बेटी, मेघा ने पहला तोफा मां को ही दिया था।

छ: महीने पश्चात मधु के भतीजे की शादी निश्चित हो गई थी । दिसम्बर का महीना था और सभी बहनें अपने बच्चों के साथ पहुंच चुकी थी। मधु की तीन बहनें व एक भाई था। मेघा मुम्बई से आई थी। सभी उसी का इंतजार कर रहे थे क्योंकि हर महफिल की वह जान होती थी। चेहरे पर हर वक्त मुस्कान लिए सभी के दिलों को जीत लिया था उसने। मेघा को लिवाने स्वयं उसका मामा गया था। शाम के समय सब इक्ठ्ठा बैठे थे तो मधु ने अपना सूटकेस खोला और सबसे पहले अपनी नानी को उपहार स्वरूप शाल दिया और फिर बड़ी मौसी, छोटी मौसी,मामा, मामी, सभी कज़न और दुल्हे के लिए खास तोफा। एक के बाद एक उपहार उसके पिटारे में से निकलते जा रहे थे। एक पूरी तंख्वाह मेघा ने बहुत सलीके से चुने हुए उपहार पर खर्च कर दी थी। मधु के लिए भी बढिया साड़ी और महंगा पर्स लेकर आयी थी। मामा सभी बच्चों का प्रिय मामा था। नाना तो बहुत साल पहले गुज़र गए थे लेकिन उनके बताए रास्ते को अपना कर सभी बच्चे उन्हें याद करते थे। नानी ने तो उसी दिन कहा था, ” मेघा जितना बड़ा दिल किसी का नहीं है”। उस दिन के बाद सभी मेघा को सैंटा ही बुलाते थे। बेटे की शादी के बाद, विदा होते वक्त मेघा के मामा ने भी उसे खास उपहार दिया था। मैं और मधु तो खास सहेली होने के नाते एक दूसरे के मायके में विवाह समारोह आदि में एक बेटी की हैसियत से ही जाते रहते हैं।

मधु के लिए तो वह हमेशा सैंटा ही बनी रही। जब से नौकरी लगी है बेटी मेघा की लायी हुई साड़ी, पर्स और पेन इस्तेमाल करती आई है। छोटी छोटी चीज़ें जो कभी मधु को आकर्षित करती थी सब घर में लाकर सज़ा दी।घर का कोई कोना ऐसा नहीं था जहां मेघा द्वारा लाई गई वस्तुएं ना हो। मधु अब लगभग साठ वर्ष की हो गई है लेकिन बेटी के उपहार लाने का सिलसिला निरंतर जारी है। ऐसा नहीं है कि मधु उसके लिए कुछ नहीं लाती। जब भी जरूरत होती है वह उसे देती रहती है, खासकर मधु को सोने में निवेश करना ठीक लगता है क्योंकि ये औरतों के लिए गहना भी रहता है और आड़े वक्त में काम भी आ जाता है।…

दो साल पहले मधु की भानज़ी की शादी थी, डेस्टिनेशन वेडिंग थी। मधु तो जाने में हिचक रही थी कि शादी के हिसाब से कपड़े भी बढ़िया होने चाहिए और वह ज्यादा खर्च करना नहीं चाहती थी। तब बेटी मेघा दिल्ली आ चुकी थी और मधु को अपने साथ मॉल में लेकर गई और पंसदीदा प्लोज़ो सूट व सरारा आदि दिलवाया। मेंहदी के वक्त पहनने के लिए धोती सलवार । सब दिलवाने के बाद कहती है,” अब मैं सन्तुष्ट हूँ कि आपकी शोपिंग हो गई”। मधु तो मेरी खास सहेली है और हमारे घर भी पास पास हैं तो हम लगभग हर रोज़ सैर के समय मिल लेतें हैं…।

मेघा को कम्पनी की तरफ से एक सप्ताह के लिए चीन जाने का अवसर मिला तो मधु थोड़ा घबराई हुई थी लेकिन हम सबने कहा कि आज़कल बच्चे बाहर जाते रहते हैं तो घबराओ नहीं। एक सप्ताह बाद लौटी तो चीन से भी काफी उपहार मधु और नानी के लिए लाई थी। मधु बताती है कि ” मेघा, नानी को कभी नहीं भूलती।”। चूंकि मेघा की नानी पूजा पाठ करती है तो उनके मंदिर के लिए घंटी, दीपक और अलग अलग खशबू की अग़रबती इत्यादि लाती रहती है। यूं तो नानी के लिए सभी बहनों के बच्चे कुछ ना कुछ लाते रहते हैं लेकिन मेघा की तो बात ही अलग है। बचपन में छ महीने नानी की गोद में पली थी चूंकि उस वक्त मेघा दूसरे राज्य में नौकरी करती थी। शायद वही जुड़ाव है नानी और दोहती का। पति की बिमारी की वज़ह से मधु ने सरकारी नौकरी छोड़कर उसी शहर में एक नामी स्कूल में ज्वाइन कर लिया था और पति की खूब सेवा की थी लेकिन जिंदगी में मधु और बेटी को छोड़कर वे परलोक सिधार गए थे और मधु अपने में ही सिमटकर रह गई थी। लेकिन अब मेघा हर खुशी अपनी मां के चरणों में डाल देना चाहती है।..

पिछले क्रिसमस पर तो मेघा अपनी सहेली के साथ राजस्थान में निमराना गई थी और बेडशीट, कम्फर्टर, कढ़ाई वाली जूतीयां, हैंडबैग आदी आदी। उस वक्त मैं भी मधु के घर ही बैठी थी तो एक वॉल हेंगिंग मुझे भी दिया और फिर अपनी मां को एक एक चीज़ बहुत उत्साहित होकर दे रही थी। सब वस्तुओं को देने के बाद कहती है,” मम्मा और कुछ चाहिए , आज़ आपका सांटा आया है”। उस वक्त मेघा को आशीर्वाद देते हुए मैं अपने घर लौट आई और सोचती रही “काश मेरी भी बेटी होती, जो अपनी मां के ऐसे ही सैंटा बनती”।

✍️©®”जोया” 25/12/2018

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अल्फाज़ों की सिसकियां

जनवरी माह की की कड़कड़ाती ठंड। सुधा अपने दोनों बच्चों के साथ रज़ाई की गरमाहट में महफूज थी कि रात के लगभग दो बज़े फोन की घंटी बज उठती है। दूसरी तरफ से किसी अनज़ान आवाज़ को सुनकर वह सकते में आ गई।” मैडम मैं रोहित, रामनगर से बात कर रहा हूं। क्या आप श्रीमती सुधा शर्मा हैं?””हां, हां मैं सुधा ही बोल रही हूं। आप कौन हैं और फोन क्यों कर रहे हैं इस वक्त?”सुधा बहुत ही सख्त मिज़ाज औरत थी। खासकर अनजाने कॉल पर तो उनका पारा सातवें आसमान पर होता था। उधर से फिर आवाज़ आई, ” मैडम, क्या विपुल शर्मा ही आपके पति हैं?””हां, लेकिन आप क्यों रात में इस तरह के सवाल कर रहे हैं?”” मैडम, मैं रामनगर का ही रहने वाला हूं और किसी कारणवश आज़ मुझे जल्दी अपने घर पर पहुंचने में देर हो गई””तुम मुझे क्यों परेशान कर रहे हो इस वक्त?””मैडम, थोड़ा दिल मज़बूत कर लें, क्योंकि जो खबर मुझे सुनानी पड़ रही है वह बहुत दर्दनाक हादसे की है”सुधा को ध्यान आया विपुल को भी तो आज़ रामनगर ही जाना था। लेकिन क्यों बुरा सोचा जाए, इसी ऊहापोह में थी कि फिर वही आवाज़ आती है।” सुधा जी मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आपके पति विपुल भयानक कार दुर्घटना में चल बसे हैं”।
सुधा को अभी भी अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था और वह प्रार्थना की मुद्रा में बैठी रही और भगवान से विपुल की सलामती की पुकार कर रही थी, एक उम्मीद की किरण लिए कि कहीं कुछ गलतफहमी रही हो इस खबर में। दूसरे कमरे में सोये सास ससुर को भी अभी नहीं बताया गया था कि चालीस साल के जवान बेटे की खबर उनके बुढापे में दुखों का पहाड़ बनकर टूटेगी। विपुल के साथी रोहित, रामनगर रहते थे। सुधा के पास आधे घंटे बाद फिर फोन आया। इस बार विपुल के दोस्त की आवाज़ थी जिनको दुर्घटना स्थल पर बुला लिया गया था। एंम्बुलेंस विपुल को सिविल अस्पताल ले जा चुकी थी।
“भाभी मैं, रोहित बोल रहा हूं। आप हिम्मत रखें लेकिन ये सच है कि विपुल हमें बीच राह में छोड़ कर जा चुका है” रोहित का गला रूंध चुका था। इधर सुधा की हालत खराब थी।कहीं बच्चे ना जाग जाएं वह उठकर दूसरे कमरे में आ चली गई और उसकी सिसकयों में उसे दम घुटता महसूस हो रहा था। अभी रात्री के तीन बजे थे सास ससुर को भी नहीं उठाना चाह रही थी, यही सोचकर कि उनपर क्या बीतेगी। फिर उठी और फोन पर अपने भाई को इतला देकर फफक फफककर रोने लगी, लगभग अर्द्ध मूर्च्छित अवस्था में थी। तभी भाई ने उसके पडो़स में फोन किया और दरवाज़े पर जोर जोर की खट खट से सास ससुर भी उठ गए क्योंकि इस पीड़ाजनक हादसे की जानकारी उनको सुधा के भाई ने दे दी थी। सुधा की हालत काफी खराब थी, बार बार सिसकयां उसका दम घोंट रही थी। घर में मचे कोहराम से बच्चे भी उठ चुके थे। तब तक दूसरे पड़ोसी भी पहुंच गए थे और सब को ढाढ़स बंधा रहे थे। सुधा के देवर , देवरानी दिल्ली से चल चुके थे उधर भाई व माता पिता हिसार से चल चुके थे। सुधा रोहतक रहती थी। रामनगर से विपुल के पार्थिव देह को लेकर रामनगर के साथी चल चुके थे।
विपुल का काफी अच्छा कारोबार था। सात- आठ बड़े ट्रालों का मालढुलाई का कारोबार। इन पांच छ: सालों में ही तो व्यापार में बहुत पैसा कमाया था विपुल ने। उससे पहले तो काफी कठिन समय भी निकला था। सुधा स्वंय भी अच्छे पद पर बैंक में नौकरी करती थी तो कठिन दौर को भी निकाल लिया था। पिछले पांच सालों में तो लक्ष्मी ने छप्पर फाड़ कर दिया था और विपुल अपने बच्चों के बहुत लाड़ करते थे बल्कि सुधा की माने तो “बिगाड़” दिया था। तीन साल में तीन नयी गाड़ियां घर में सबके लिए लाकर रख दी थीं। सुधा को कहते थे ” बिल्कुल फिकर ना करो। मेरे बच्चे नवाब की तरहं पलेंगे”। सुधा जमीन से जुड़ी महिला थी और वह कहती थी, ” सपने ऊचें लो लेकिन पैर जमीन पर ही टिके रहने चाहिएं”। सुधा बहुत व्यवाहरिक महिला थी। संघर्ष का दौर देखा था। विपुल खुशमिजाज़ व मस्त किस्म का बन्दा था।
दुनिया के लिए तो सूरज़ उग गया था लेकिन सुधा के लिए आज़ ये अंधेरा ही लेकर आया था। दोपहर तक विपुल का पार्थिव शरीर घर के आंगन से अंतिम विदाई के लिए पंहुच चुका था। तब तक खबर शहर में आग की तरह फैल गई थी। विपुल बहुत मिलनसार थे। स्थानीय राजनीति के लोगों से भी खासा जान पहचान थी। घर के आंगन में पैर रखने की जगह नहीं थी। सुधा का रो रोकर बुरा हाल था। ससुर भी बार बार आकर बहू को सांत्वना दे रहे थे यद्धपि उनका दुख कुछ कम नहीं था। सबके रिश्ते अपनी जगह थे। सुधा के बच्चे नौ व तेरह साल की उम्र में भी मां का संबल बन रहे थे। इतनी छोटी उम्र में भी उन्होंने स्वयं को मां के सामने कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। अब सुधा ही उनकी मां थी और पापा भी।
सांयकाल पांच बज़े अंतिम संस्कार कर दिया गया। सुधा की बड़ी बहन वहीं रुक गई थी क्योंकि सुधा को परिवार के सहारे की जरुरत थी। देवरानी सारे व्यवसाय से संबंधित कागजात को इकठ्ठा कर रही थी। सुधा की हिम्मत नहीं थी कुछ भी देखने की। उसके आंसू अविरल बहते जा रहे थे। तेरह दिन तक ढाढ़स बंधाने वालों का आना जाना लगा रहा। तेरवहीं के पश्चात ही परिवार की परीक्षा होती है, एक वैधव्य से पीड़ित पत्नी के लिए आगे का सफ़र कठिन होता है…।
विपुल ने एक कम्पनी बना कर अपना व्यवसाय शुरू किया था जिसमें माता पिता, देवर देवरानी, पत्नी और एक दो दोस्तों को मिलाकर बनायी थी। जहाँ पैसा अधिक हो जाता है वहां पर झगड़े प्रोपर्टी को लेकर होना लाजिमी है। कुछ समझदार लोगों को छोड़कर जिन्हें परिवार को बांधना आता है। सुधा के अनुसार पैसा विपुल ने लगाया था, बैंक लोन वगैरा था जो उसने ही चुकता किया था अब लेकिन दावेदार सभी हो गए, दोस्तों को छोड़कर। देवर, देवरानी से सुधा के रिश्ते अब तल्खी भरे हो गए। सास ससुर को भी बेटे के जाने का दुख कम और पैसे पर निगाह ज्यादा थी। बहुत बार मुझे आभास होता है कि शादी करने के बाद लड़के भी मां बाप के लिए पराये हो जाते हैं उस वक्त खासकर जब उन पर कोई तकलीफ आ जाए और ऐसे हादसों में तो वैधव्य झेल रही पत्नी जैसे दुश्मन दिखाई देती है। उसके दिल पर क्या गुज़रती है परिवार वाले तो समझने को तैयार नहीं।
सुधा के साथ भी ऐसा ही हुआ और सारी प्रोपर्टी के बराबर हिस्से हो गए। रिश्तों में कड़वाहट इस कदर थी कि सुधा अपने बच्चों को लेकर दूसरे शहर चली गई और बड़ी बहन की मदद से एक प्लाट भी खरीद लिया। पैसे की दिक्कत नहीं थी लेकिन सही जगह दिलवाने के लिए भागदौड़ करने वाला भी तो हो। विपुल जीवित थे तो हमेशा सुधा को गाड़ी में भेजते थे कार्यस्थल पर लेकिन सुधा को गुरूग्राम जैसे शहर में मकान भी बनाना था तो गाड़ी का कुछ साल के लिए इस्तेमाल बंद कर दिया। बच्चे अभी छोटे थे। समय बीतता गया…और दोनों बच्चों की शिक्षा दिक्षा पूरी करके खूब अच्छी शादियां की लेकिन हर एक क्षण पति विपुल की यादें सुधा के साथ रहती थी। बेटी की विदाई के भावुक क्षणों में सुधा की आंखें सज़ल हो गई और अल्फाज़ों की सिसकयां जारी रही।
✍️©®”जोया”21/12/2018

निर्णय

सविता अपने पिता की सबसे लाडली बेटी थी। वह स्वभाव से भी बहुत ही विनम्र होने की वजह से अपनी सहेलियों मे भी बहुत लोकप्रिय थी। कालेज मे हमेशा अव्वल रहते हुए स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने के पश्चात वह एक बोर्डिंग स्कूल में शिक्षिका के पद पर चयनित हो गई। गजब की सुंदरता की धनी थी वह। एक से एक बढिय़ा रिश्ते आये उसके लिए लेकिन उसके पिताजी को पंसद नही आते थे। ये 1986 के दशक की कहानी है। विदेश मे स्थापित अच्छे लड़को के रिश्ते भी आये लेकिन सविता के पिताजी उसे अपने से दूर नहीं भेज़ना चाहते थे।

सविता की शादी फिर एक आर्मी अफसर से तय कर दी गई। सभी आश्चर्यचकित थे कि सविता जैसी सुंदर पत्नी मिली है कैप्टन राजेश को। सविता के लिए ये शादी लेकिन अभिशाप बनकर आयी थी क्योंकि सुहागरात वाले दिन से ही राजेश अलग कमरे मे सोता था। राजेश ने सविता को उस सुख से वंचित रखा जिसके लिए लड़की कितने ही हसीन ख्वाब देखती है। सविता ने शर्म की वज़ह से इस के बारे मे किसी से कुछ नही कहा।लेकिन वह एक घुटन में जिंदगी जी रही थी। वह एक ब्याही हुई भी कुवांरी रहने को अभिशप्त थी।

मायके मे किसी से कुछ नही बता पायी क्योंकि अभी उसकी छोटी बहन की शादी होनी थी और उसने सोचा कि यदि वह तलाक लेती है तो बहन की शादी नही हो पायेगी। पिता तो निश्चितं थे कि आर्मी वाले मेडिकल फिट होते हैं।…इस उहापोह की जिन्दगी में उसके तीन साल बीत गए। कभी कभी तो आत्महत्या तक के विचार आते थे। पति साथ होते हुए भी कभी संसर्ग नहीं हो पाता था क्योंकि पति काम से थक कर लौटते और एकदम बिस्तर पर आते ही खराटे लेते हुए नींद के आगोश मे चले जाते।

स्कूल की छुट्टियों में राजेश के साथ सविता आर्मी कल्ब की पार्टियों में भी जाती थी जंहा दूसरे अफसर उसे हसरत भरी निगाहों से देखते थे। सविता इन पार्टियों की जान होती थी और जिस तरह से वह महफिल को सज़ाती थी सब उसके दिवाने होते चले गए। आर्मी आफिसर उसके साथ डांस पर थिरकते थे तो राजेश मन ही मन कुठ़ा से ग्रसित रहते थे क्योंकि अपनी कमजोरी से वाकिफ थे। सविता ने इन तीन सालों में बहुत बार कहा कि सैक्सोलोजिष्ट से मिल लेते हैं। लेकिन राजेश साफ मना कर देते थे क्योंकि यह उसके अहम व पुरूषत्व पर चोट थी।परेशान होकर सविता ने पूछा कि फिर आपने मुझसे शादी ही क्यों की? कैप्टन राजेश का एक ही उत्तर था कि मां बाप की खुशी के लिए।

सविता छुट्टी खत्म होने पर अपने बोर्डिंग स्कूल में अपने निवास पर आ जाती थी। इस बीच छोटी बहन की भी शादी हो गई थी। सविता का धैर्य जवाब देता जा रहा था। उसकी बडी़ बहन दूसरे प्रदेश में नौकरी पर थी। इस शादी मे उनकी मुलाकात हुई तब सविता के सब्र का बांध टूट गया और उसने सारी बातें अपनी बड़ी बहन कविता से सांझा की।कविता हमेशा से ही समाज़ से टक्कर लेती आयी थी। उसने सब बातें अपने पिता से शेयर की । पिता अपनी बेटी के दुःख से बहुत परेशान हुए। वे कविता पर बहुत विश्वास करते थे और मानते थे कि वह कभी झूठ नही बोलेगी। संयुक्त परिवार मे कुछ सदस्यों का ये भी मानना था कि हो सकता है दोनों बहनें कोई और योजना बना रही हों। परिवार के दूसरे बुजुर्गों से सलाह मशवरा किया गया। बड़े ताऊ व पिताजी ने तो तुरंत निर्णय किया कि बेटी को और परेशान नहीं देख सकते।
पंचायत लेकर वे राजेश के घर वालों से मिले। उन दिनों राजेश भी छुट्टी आया हुआ था। उसके माता पिता ये मानने को तैयार ही नहीं थे कि उनके बेटे में कमी है। राजेश भी मां बाप के सामने चुप रहा और राजेश की बहने सविता की ही कमीयां गिनवाने लग गई। कितना आसान होता है बहू को दोषी ठहराना, जबकि राजेश के परिवार वाले जानते थे कि सुहागरात वाले दिन भी राजेश दोस्तों के साथ समय बीता कर भोर के समय लौटा था। और उसकी दुल्हन इंतजार करके आंसू पीकर सो गई थी। लेकिन समाज़ पुरूष प्रधान है और बहुत सी महिलाएं भी जाने अनजाने पित्तरात्मक सता की वाहक बन जाती हैं क्योंकि उन्हें बचपन से ही इस तरह के संस्कारों की घुट्टी पिलाई जाती है।

लेकिन सविता के घर वालों ने तलाक की अर्जी लगा दी थी। कोर्ट में जिस तरह से राजेश के वकील बहस कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था जैसे भरी सभा में सविता का चीरहरण हो रहा हो। लेकिन सविता घबराई नहीं और अपने निर्णय पर अडिग रही। राजेश और सविता को छह महीने का समय दिया गया तालमेल बिठाने के लिए। लेकिन यहां तो कभी ताल ही नही मिली थी तो मेल कैसे होता।

छ महीने पश्चात आखिर दोनों को मयूचवल तलाक की इजाज़त मिल गई। सविता ने राहत की सांस ली । उसे ये महसूस हो रहा था जैसे कैद से रिहा हुई हो। अब उसका लक्ष्य था अपने कर्मक्षेत्र में नाम कमाने का। वह बहुत लगन से बोर्डिंग स्कूल मे पढ रहे छात्रों के साथ मेहनत करती रही। पिताजी ने दूसरी शादी के लिए उससे राय ली क्योंकि वह अपनी सबसे लाड़ली बेटी के दुख से टूट चुके थे। उन्होंने ने उस ज़माने में तलाक दिलवाया जब समाज़ तलाकशुदा लड़की को स्वीकार नहीं करता था।

लेकिन अहम बात ये थी सविता शिक्षित होने की वज़ह से आत्मनिर्भर थी और उसने अपने जीवन को शिक्षा के प्रति समर्पित कर दिया। माता पिता की सेवा करके उनके आशीर्वाद की हकदार बनी रही और जीवन के नये आयाम गढे़। आज़ सविता के द्ववारा पढाये हुए बच्चे देश विदेश में नाम कमा रहे हैं। वे हमेशा सविता के संम्पर्क में रहते हैं और आभार प्रकट करते हैं कि उनके जीवन का सही मार्गदर्शन किया। इस तरह सविता का परिवार बहुत बडा़ है जहाँ प्रेम की जलधारा निरन्तर बहती रहती है। एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी क्या उपलब्धि हो सकती हे।

✍️©® “जोया” 20/09/2018)

हमराही

हाथों में लिए हाथ
चलते रहे हम साथ साथ।

ढोल की थाप
बढ़ता रहा तुम्हारा प्रताप।

सरल हृदया को तुमने अपनाया
जीवन सुखद मेरा बनाया।

समाज की कुदृष्टि से बचाया
पल पल हौंसला बढ़ाया।

जीवन की प्रीत भरी डगर
नहीं होने दी कोई अगर मगर।

मंजिल हमारी एक रही
सन्तुष्टी की बयार बही।

रहा कभी अंधकार का दौर
समरसता से हुई पावन भोर।

आंगन में दो फूल खिले
पल पल ममत्व की लहर फले।

जीवट के रहे हम हमेशा धनी
झेल गए गृहस्थ जीवन की तनातनी।

मानवीय भूलों को किया क्षमा
निभाई जीवन रीत बन परवाना और शमा।

घौंसले से उड़ गए पंछी भर कर उड़ान
प्रीत सांझ की वेला में फिर चढ़ी परवान।

सात जन्मों का नहीं कोई लेखा जोखा
इस जन्म के रहे साक्षी, जीवन बिताया चोखा।

प्रभु से है बस यही दरकार
साथ रहे यूं ही बरकरार।

सांसों की जब कुंद होने लगे माला
थामे एक दूजे का हाथ
विदा हों साथ साथ
इस जहां से बन हरफनमौला।

✍️©® “जोया”16/12/2018

कलाकार की मौत

सुमी पांच बहनों में सबसे छोटी। रंगरुप सब बढिया केवल कद ठिगना रह गया था। लेकिन विधाता ने इस कमी को पूरा किया था कला की कूची देकर। पिता की छोटी से नौकरी। फिर भी सभी बेटियों को पढा़या और विवाह भी करते चले गए। लड़कियां होशियार तो थी हीं 1985 के दशक में भ्रष्टाचार इतना नहीं था।इसलिए एक के बाद एक बेटी नौकरी भी लगती चली गयी। माता व पिताजी की खुशी की सीमा न थी।

सुमी ने भी परास्नातक की डिग्री हासिल की और एक स्कूल में शिक्षिका लग गई।उसके कद की वजह से अभी शादी निश्चित नहीं हुई थी। बहुत सारी पेंटिंग्स बनाई थी सुमी ने शादी से पहले। कोई भी फोटो दिखा दो, उसको हुबहु बना देती थी। पैंसिल स्कैच हो या आयल पैंटिग, हर विधा दी थी भगवान ने। किसी से नहीं सीखा था।स्वयं ही बना लेती थी। भगवान का दिया उपहार था उसके हाथों में।

पांच बेटियों की शिक्षा और शादियों के बाद पिता अब जीवन से थक चुके थे। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था। सुमी की शादी एक सुंदर शिक्षक से तय कर दी जिसके पास जमीन भी काफी थी लेकिन साथ मे तीन बहन भाईयों की शादियों की जिम्मेदारी भी। सुमी ने सभी जिम्मेदारी अच्छे से निभाई। लेकिन उसकी कला की परख किसी को न थी। न ही पति ने कोई प्रतोसाहन दिया।

दो बेटों के जन्म के बाद सुमी उन्हीं के लालनपालन में व्यस्त हो गई। बहनों ने उपहार में जो पेंटिंग बोर्ड व रंग दीये थे वे गृहस्थी की चक्की में धूल फांक रहे थे। पति मनमौजी प्रवृत्ति का इंसान था और नाम के अनुरूप कृष्ण की भूमिका में ही रहता था। खासकर जब बहन भाईयों की जिम्मेदारी से मुक्त हो गया। सुमी और गोविंद की अक्सर लडा़ई रहने लगी थी क्योंकि वह गाँव में भाभीयों की समीपता अधिक रखता था व सुमी पर घरेलू हिंसा करता रहता था। एकबार तो चारपाई के नीचे उसके कलाकार हाथों को रखकर उपर बैठ गया था। सुमी के दुख का कोई पारावार नहीं था। लेकिन उसकी आत्मा उसे जरूर धिक्कारती थी। जो हाथ सुंदर तस्वीरों का संकलन कर सकते थे उनकी इस बेकद्री से सुमी के अंतर्मन पर गहरी चोट आयी थी।

सुमी के दुख के बादल छटने का नाम नहींं ले रहे थे। चालीस साल की उम्र में उसके पति को हृदयाघात हुआ और वह सुमी और दो बच्चों को छोड़कर चले गए। अब सुसराल वाले पति की मृत्यु के लिए सुमी को जिम्मेदार ठहराने लगे। उसका पति द्वारा बनाए घर में रहना दुभर हो गया और वह गांव छोड़कर बहनों के सहारे शहर आ गई। सुमी की बड़ी बहन काफी पैसे वाली थी तो वह भी पति से छुपा कर सुमी की मदद करती रही। सुमी ने टयूशन सेंटर खोलकर अपने बच्चों की पढा़ई का खर्च उठाना शुरू किया। हाथों में जो कला थी वह तो गृहस्थी की गाडी खिंचने में दब कर रह गई। पति की पारिवारिक पैंसन जो की मासिक पंद्रह हजार रूपये थी क्या होता उससे। दिल्ली जैसी महंगाई। पति कुछ छोड़कर गए नहीं।

आठ साल बाद पति की जगह नौकरी मिली तो गृहस्थी की गाड़ी अच्छी चल पड़ी। अच्छे प्रोफेशनल कालेज़ म़े दाखिला भी दोनो लड़को को मिला। लेकिन बाप का साया न होने से बेटे बड़े होकर सुमी को परेशान करने लगे। पढा़ई बीच में छोड़कर बैठ गए कि बहुत जमीन है।

सुमी फिर बहुत परेशान रहने लगी। फिर अंत मे सब्र कर के बैठ गई। बहनों ने भी कहा अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख। ये भी खो दिया तो कौन संम्भालेगा।

मैं उसकी बहन भावना सोचती रहती हूँ कैसे गृहस्थी की चक्की में आम परिवारों में जो प्रतिभा है वह दम घोट जाती है। सुमी को यदि परिवार व पति का साथ मिला होता तो उसकी प्रतिभा इतनी थी कि बहुत बड़ी बड़ी कला गैलरी का आयोजन कर सकती थी। लेकिन परिवार यदि लीक से हटकर अपने परिवार में कला कौशल से लबरेज व्यक्ति का साथ दे तो किसी कलाकार की कला दम न तोड़े।

✍️©® ” जोया” १५/११/२०१८

सज़ा

शुभा बहुत ही नेकदिल व संवेदनशील महिला। बचपन से ही अनुशासन उसके जीवन का अभिन्न अंग रहा। अपनी हर भावना को भी उसने अनुशासित कर रखा था। बीस साल की उम्र में शादी के बंधन में बंधकर सुसराल मे सभी जिम्मेदारी निभाती रही। अतिक्रोधी पति ने उसके कोमल मन व भावनाओं को तार तार कर दिया था। फिर भी आर्दश पत्नी की तरह घर और बाहर हर कार्य को सलीके से करती रही। दो सुंदर बच्चों के आने पर तो उसका जीवन उनके पालनपोषण मे व्यस्त हो गया और पति के क्रोध को नजरअंदाज करने लगी।

लेकिन एक संवेदनशील महिला के अंतर्मन पर गहरे जख्म बनते चले गए। पति के प्रति प्रगाढ़ प्रेम होते हुए भी किसी न किसी क्षण वह कमजोर पड़ जाती थी और फिर वह अपने उस पहले प्यार की यादों में डूब जाती थी। छात्रावास में 24/7 का साथ था अनूप के साथ। बोर्डिंग स्कूल में दोनों का बारह वर्षों का साथ था और दोनों ही स्कूल कप्तान रहे। सभी के चेहते कब एक दूसरे के करीब आए उसका अहसास बिछुड़ते वक्त हुआ। दोनों का मूक प्रेम हृदय की गहराई तक पैठ बना चुका था।1980 के दशक में आम घरों में प्रेम एक गुनाह की तरह देखा जाता था।फलतः दोनों ने अपने प्रेम को माता पिता की आज्ञा के सामने झुका दिया। लेकिन क्या वास्तव में झुक पाए। नहीं।

हर क्षण ये प्रेम प्रगाढ़ होता चला गया। जीवन चलता रहा और बीस साल के अंतराल पर पूर्व छात्र मिलन समोरह में शुभा पुराने साथियों से मिली तो अनूप का पता मिला जो फौज मे कर्नल के पद पर कार्यरत था। पत्र व्यवहार शुरू हुआ। शुभा ने पति से इजाजत ले ली थी। उधर अनूप ने पत्नी को भी विश्वास में लिया था।दोनों परिवार एक दूसरे से मिले भी। जीवन में खुशियां शुभा के लिए लौट आयी थी। वो खुशी जो उसके पोर पोर को आंनद से सरोबार कर गई थी।

शुभा कालेज़ में प्रोफेसर पद पर नियुक्त थी। उसने सब बातें अपनी खास़ सहेली शिखा से सांझा की। इन दोनों परिवारों का भी काफी आना जाना था। ऊषा के पति शुभा को पसंद करते थे। शिखा हंसी मज़ाक में सब बताती थी कि कैसे उसके पति अजय शुभा पर फि़दा हैं। शुभा सब बातें हंसी में टाल देती थी। क्योंकि बातें हंसी ठिठोली तक सीमित थीऔर दोनों सहेलियां अपनी अपनी गृहस्थी में स्थापित होकर अपने जीवनसाथीयों का विश्वास हासिल कर चुकी थी। दोनों अपने युवावस्था के किस्से साझां करके मस्त रहतीं थी। शुभा का हृदय तो अपने पहले प्यार अनूप के लिए धड़क रहा था। लेकिन यह भी बस हंसी मजाक तक ही सीमित था। शुभा की प्रेम से परिपूर्ण मन की जानकारी शिखा के पति को थी और उसने योज़ना बनाई कि किस तरह वह शुभा की उस वक्त की भावनात्मक कमजोरी का फायदा उठाया जाए। एक दिन अजय शुभा के घर आए जब शुभा के पति दूसरे शहर अपनी डयूटी पर जा चुके थे और बच्चे स्कूल। शुभा ने उस दिन छुट्टी ले रखी थी। ये बात अजय को शिखा से पता लग गई थी। शुभा चाय बना कर लाई। दोनों हंसी मजाक कर रहे थे और अनूप को लेकर भी बातें चर्चा में थी। शुभा की भावनात्मक कमजोरी का फायदा उठा कर अजय ने बाहुपोश में भरकर अपनी मर्दाना छाप छोड़नी चाही जिसका शुभा ने विरोध किया और शिखा को बताने की धमकी दी। अजय क्षमा याचना करने लगा और कहा आंइदा ऐसी कोई हरकत नहीं होगी। शुभा ने उसे माफ़ कर दिया ये सोचकर की क्यों बात को बढ़ाया जाए और वह शिखा की गृहस्थी में भी कोई विवाद नहीं पैदा करना चाहती थी और ना ही अपनी गृहस्थी में। एक मानवीय भूल समझ कर अजय को माफ़ कर दिया था।

लेकिन शुभा के लिए ये घटना अपराध बोध की ग्लानि बन गई थी और वह अपना मानसिक संतुलन उस वक्त खो बैठी जब शिखा ने कहा कि ” अजय कह रहा था कि तुम सन्तुष्ट नहीं हो और इसलिए अनूप से संपर्क बनाए रखना चाहती हो”। शुभा के लिए ये कटाक्ष बहुत भारी था क्योंकि अजय ने जो कुछ किया उसका जिक्र वह किसी से कर नहीं सकती थी। सहेली का पति होने के नाते चुप रहना ही ठीक समझा। आखिर गलत उसी को समझा जाता। फिर वह यह भी समझती थी कि क्षणिक कमजोरी किसी से भी गलत कदम उठवा सकती है। बात है कि उसे दुबारा न दोराहा जाए। अजय क्षमा मांगकर गया था कि फिर कभी ऐसा नहीं होगा।

शुभा ने हृदय से क्षमा किया लेकिन वही अजय उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा था। अपराध बोध से ग्रसित, मानसिक तनाव और किसी से भी साझा नहीं कर पाने से शुभा दो महीनों तक बिस्तर में पागलों की हालत में पड़ी रही। दवा भी काम नहीं कर रही थी क्योंकि डाक्टर को असली ज़ड बताये तभी तो सटीक इलाज हो। पति को देखते ही भयभीत हो जाती थी कि इनको पता लग गया तो क्या होगा। अपने में घुटती रही। ईलाज़ से ज्यादा फायदा नहीं हो रहा था। क्रोधी पति शुभा की बिमारी से परेशान होकर उसे इस विक्षिप्त हालत में भी बुरी तरह पीटते थे जिसका परिणाम ये हुआ कि शुभा की बीमारी और बढ़ गई। पति ने परिवार के दवाब में आकर तलाक की अर्जी लगा दी थी। शुभा की मानसिक हालत को तलाक का आधार बनाया गया था। शुभा की सास की तो शुरु से ही नज़र थी कि बेटे की आमदनी उसे मिलेगी अब।आग में घी डालने का काम शिखा ने किया, जो कालेज़ में शुभा की प्रतिष्ठा से मन ही मन शायद द्वेष रखने लग गई थी। उसने शुभा के पहले प्यार के प्रति सुंदर भावनाओं को खूब बढा़ चढा़ कर शुभा के पति और सुसराल वालों के सामने पेश किया। शुभा और अनूप के रूहानी रिश्ते को अपनी संकीर्ण मानसिकता के अनुसार देखा।

शुभा ने फिर बीमार अवस्था में ही सब जिम्मेदारी सम्भाली क्योंकि उसे दो मासूम बच्चों के भविष्य की चिंता थी।…कठिन समय में कोई किसी का नहीं होता।…घटनाक्रम ने शुभा के जीवन के पूरे अठारह साल लील लिए। जिंदगी फिर पटरी पर लौटी । शुभा के दोनों बच्चे बड़े पदों पर आसीन हो गए। सारा बोझ अपने अकेले कंधों पर ढो़ती हुई शुभा भी पहले से ज्यादा मजबूत होकर निखरी है।

शुभा ठीक होने के बाद मुझ से वार्तालाप में कहती है कि लोग हर रोज़ पता नहीं कितने गुनाह करते हैं। दूसरे लोगों से शारिरिक संबंध भी बनाते हैं। समाज़ में लेकिन सफेदपोश बनकर रहते हैं। और यहां क्षणिक कमज़ोरी की इतनी बड़ी सज़ा उसे मिली। उसकी बात ने मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया कि हर व्यक्ति कभी न कभी इस तरह की गलती कर बैठता है लेकिन जब तक किसी को पता नहीं चलता तो वह पाक साफ है और दूसरों पर वाणी के तीर चलाता है और निर्णायक की भूमिका निभाता है।

✍️© ®”जोया”१५/११/२०१८

आत्मसम्मान

कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन ही मेरी सुसराल में गोगा पीर का मेला भरता है और आसपास के गांव से भी अनगिनत लोग इस मेले में धोक लगाने और पीर पर चादर चढा़ने आते हैं।इस बार मैं भी गई थी शहर से इस मेले मे शरीक होने के लिए। पूजा अर्चना के बाद मैं मेले मे अपनी अपनी फड़ी लगाए सामान बेचने वालों के बीच पहुंच गई। वहां पर मेरी नज़र रंग बिरंगी चूडियां लिए एक औरत पर पड़ी जो जमीन पर बैठकर चूडियां बेचने के लिए लोगों को बुला रही थी। यद्धपि मैं चूडिय़ां केवल त्योहार पर ही पहनती हूं लेकिन ये रंग बिरंगी चूडियां मुझे बहुत आकर्षित करती हैं।

अभी चूंकि बहुत खरीदार वहां नहीं थे तो मैंने उस चूड़ी बेचने वाली औरत से बातचीत शुरू कर दी। बातों ही बातों में मुझे पता लगा कि उसकी शादी कम उम्र ही हो गई थी।और कि उसकी दो लड़कियां हैं जो स्कूल जाती हैं।उसका पति शराब पीने का आदी थे और इसी आदत की वजह से उसका लीवर खराब हो गया था। घर मे जो जमा पूंजी थी वह भी इलाज पर खर्च हो गई और अंत मे वही अंजाम हुआ जो नशेडियों का होता है। उसका पति बीच मझधार में उसे छोड़ कर चल बसा।

अब दोनों बेटियों की जिम्मेदारी इस महिला पर आन पडी़। आजकल रिश्ते नातेदार कौन किसका बोझ उठाता है। सुसराल में पांच बीघा जम़ीन थी लेकिन अब उसके देवर ने कब्जा कर रखा था। भतेरी पढी़ लिखी नहीं थी इसलिए वह कुछ कर नही पायी। फिर उसने बताया कि कैसे उसने चूडिय़ां गांव गांव बेचकर अपनी जीविका कमानी शुरू कि और बेटियों को स्कूल में भेज़ना शुरु किया। मैने कहा
“तुम बेटियों को क्यों पढा़ना चाहती हो?”

” मैं चहाती हूं कि मेरी बेटी पढ़ लिखकर आपकी तरह अफसर बने”

मैंने उसकी लग़न देखते हुए कहा कि चलो
“तुम्हारी बेटी का पढ़ाई का खर्च मैं उठाती हूं”
उसने तुरंत कहा ः
“डा. साहब आपका बहुत बहुत धन्यवाद। लेकिन मैं अपनी बेटियों को अपनी मेहनत की कमाई से ही पढ़ाऊंगी, ताकि मेरी बेटियों को धन, समय और मेहनत की कीमत पता चले।
मैंने बात को आगे बढा़ते हुए कहा कि
“तुमने चूडिय़ां बेचने का फैसला ही क्यों लिया?”
भतेरी ने मुस्कुराते हुए कहा..
“मैं चाहती हूं कि ये रंग बिरंगी चूडिय़ां हर युवती, महिला और प्रौढ़ा के जीवन में हमेशा रंग भरती रहें और उनका सुहाग बना रहे।

मैं उस सादाहरण लिबास में बेठी उस महिला की समझ और आशावादी दृष्टिकोण की कायल हो गई। ये शब्द मैं एक ऐसी महिला से सुन रही थी जो स्वंय विधवा का दंश झेल रही थी। जहां बहुत सारी महिलाएं तो अपना दुखड़ा ही रोती रहती हैं , यहाँ मैं एक ऐसी महिला से रूबरू थी जो सबके लिए मंगल कामना करती हुई हंस कर जिन्दगी का सामना कर रही थी।

उस दिन मैंने अपने लिए भी कई दर्जन चूडिय़ां खरीदी क्योंकि इन चूडियों मे इस महिला की दुआएँ छिपी थी। उसको मैं अपना पता देकर आयी थी कभी जरूरत पड़े तो मुझ से संमपर्क कर लेना।….

समय बीतता गया और मैं भी बेटे के साथ विदेश जा बसी थी। बेटे के विवाह के बाद आज़ में फिर गोगा पीर पर धोक लगाने आयी थी। मेले में मेरी निगाहें भतेरी को ही ढूंढ रही थी। फिर मेरी नज़र उस पर पडी़। वह दो महिला पुलिसकर्मीयों से बातें कर रही थी। बेटे बहू के साथ मैं उसके पास गई। उसने भी मुझे तुरन्त पहचान लिया और कुशलक्षेम पूछी। फिर उसने उन महिला पुलिसकर्मीयों को इशारा करके अभिवादन के लिए कहा। वह मेरी जिज्ञासा समझ चुकी थी। उसने कहा..
” ये मेरी दोनों बेटियां हैं जो पढ़ लिखकर अब महिला सुरक्षा का दायित्व सम्भाल रही हैं”

मैंने उन्हें गले से लगाते हुए सुखी जीवन का आशीर्वाद दिया।
भतेरी के त्याग, समझ और जिजीविषा की उस दिन मुरीद हो गई थी। उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था कि कठिनाई हमारे रास्ते में बाधा नहीं बन सकती और औरत यदि चाहे तो अपनी कहानी खुद लिख सकती है। और एक स्वस्थ समाज़ के निर्माण में अहम भूमिका निभा सकती है। शुरुआत कितनी भी छोटी हो, सपने छोटे नहीं होने चाहिएं।

✍️©®”जोया” 02/10/2018

नियति

एक दूसरे से मिलने की कसमें खाकर रोहित और निशा कालेज खत्म करके अपने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अलग हो जाते हैं। रोहित को विदेश की आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रवेश मिल गया था और निशा भारत मे ही प्रबंधन की छात्रा बन गई। दोनों का प्यार कालेज मे सभी के लिए मिसाल बन गया था और सभी आश्चर्यचकित रहते थे कि कैसे रोहित निशा पर जान छिड़कता है। निशा खुश थी और गर्वित भी रहती थी कि कोर्स खत्म होने पर दोनों जीवनसाथी बनकर इश्क के सागर में डुबकियां लगाएंगे। समय पंख लगाकर उड़ रहा था।…आज निशा बहुत खुश थी कि रोहित देश लौट रहा है और उसने कितनी ही योजनाएं बनायी थी कि कैसे एक साथ अपने आगामी जीवन की रुपरेखा तैयार करेगें।…
निशा को सुंदर सी साड़ी पहने मां ने देखा तो इस श्रृंगार का कारण पूछा तो निशा ने कहा अभी वह एयरपोर्ट अपने मित्र को लेने जा रही है और वापिस आकर सब बता देगी। मां तो बेटी के इस सुंदर रुप से ही बहुत खुश थी । चूंकि निशा का कोर्स भी खत्म हो गया था तो मां भी उसके लिए रिश्ते ढूंढ रही थी। निशा के पिता तो बहुत पहले ही एक दुर्घटना में चल बसे थे। मां और मामा पर ही अब निशा की शादी की जिम्मेदारी थी। मां ने कितने ही गहने और कीमती चीजें उसकी शादी में देने के लिए तैयार कर रखी थी।…

प्लेन का समय हो गया था और निशा सुंदर फूलों का गुच्छा लेकर रोहित को रिसीव करने लाउंज मे बेसबरी से इंतजार कर रही थी। उसकी दिल की धड़कनें मिलन की उत्सकुता में बढ़ती जा रही थी। एक एक करके यात्री लाउंज की ओर बढ़ रहे थे। निशा की निगाहें रोहित को तलाश रही थीं। थोड़ी देर बाद रोहित हाथ हिलाता हुआ लाउंज की तरफ़ आ रहा था। रोहित को रिसिव करने के लिए उसके परिवार के सदस्य भी आए थे। रोहित के बग़ल में एक सुंदर युवती भी एक छोटे बच्चे को गोद मे लेकर चल रही थी। निशा ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि रोहित से उसकी हर सप्ताह बात होती थी और वही प्यार की कसमें दोहरायी जाती थी। निशा देख रही थी कि रोहित उसकी तरफ़ हाथ हिलाते हुए अपने परिवार की ओर बढ़ जाता है और उस लड़की को इशारा करता है माता पिता के पांव छूने के लिए। वे भी उसे गले से लगा लेते हैं और अपने पोते को गोद मे लेकर एयरपोर्ट से बाहर खड़ी अपनी गाड़ी में बैठ जाते हैं। रोहित जल्दी से निशा के पास आता है और बताता है कि कैसे माता पिताजी की मर्जी के सामने वह झुक गया था। और उन्हें खुश करने
हेतू उसने ये शादी की है.. और कि अब वे अब अच्छे दोस्त बनकर रहेंगे।..
अब बारी निशा की थी। उसने आव देखा न ताव और एक झन्नाटेदार थपड़ रोहित के गालों पर जड़ कर सीधा अपनी गाड़ी में बैठकर वापिस लौट आती है। उसकी दुनिया लुट चुकी थी… मां ने देखा कि निशा बहुत उदास रहने लगी है। बेटी के दर्द को वह अच्छे से समझ सकती थी। मां से ज्यादा कौन अपने बच्चे को जान सकता है। एक नारी भी यदि नारी की व्यथा न समझ पाए तो नारी जीवन धिक्कार है। मां ने निशा को इस दुख से उबरने मे पूरा सहयोग दिया और उसे आगे बढ़कर जीवन को नये आयाम देने के लि प्रेरित किया। निशा ने अब ठान लिया था कि प्रबंधन के क्षेत्र में आगे बढ़कर जीवन की नयी इबारत लिखनी है।…समय अब तेज़ गति से दौड़ रहा था। निशा अपनी कम्पनी की M.D. बन चुकी थी और कार्पोरेट की दुनिया में एक विशिष्ट पहचान बना चुकी थी।… दस साल बाद एक बार फिर रोहित से आमना सामना होता है। लेकिन इस बार निशा उस सभा में मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुई थी और रोहित को उसके उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित करने के लिए आमंत्रित किया गया था। दोनों एक क्षण के लिए ठिठक जातें हैं। जलपान के दौरान निशा को मालूम हुआ कि रोहित की पत्नी उसे छोड़कर वापिस विदेश जा चुकी है।…

निशा ने आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय ले लिया था। कुछ दिन बाद दरवाज़े पर घंटी बजती है और सामने रोहित को पाती है। कुछ क्षण के लिए वह अनिश्चितता की झिझक में खड़ी रहती है। रोहित के कहने पर कि अन्दर आने को नही कहोगी, तब उसकी तंद्रा टूटती है। टेबल पर चाय परोस दी गई थी… दोनों चुप्पी साधे हुए चाय की घूंट भर रहे थे। फिर रोहित ने ही बात शुरू करते हुए प्रस्ताव रखा कि वह उसे जीवन साथी बनाना चाहता है। लेकिन निशा के लिए जीवन के मायने बदल चुके थे। उसने एक संस्था खोल रखी थी जहां वह जिन्दगी में हताश लड़कियों की हर प्रकार से मदद करती थी और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनकी योग्यता अनुसार कार्य क्षेत्रों में स्थापित करने का काम करती थी। वह इन सब की मार्गदर्शक बन चुकी थी और “दीदी” के रूप में सभी उसे प्यार करती थी।…

निशा ने बड़ी विनम्रता के साथ रोहित का प्रस्ताव ठुकरा दिया। पुराने समय की यादें अभी ताज़ा थी और वह अपने जख्मों के उपर आयी परत को हटाना नहीं चाहती थी। इन scars ने उसे एक बल प्रदान किया था । सचे मन से प्यार करने वाले दुबारा कोई मौका नहीं देते। निशा और रोहित की राहें बहुत पहले अलग हो चुकी थी। नियति ने उन्हें दुबारा भी मिलाया लेकिन निशा का फलसफा स्पष्ट था। उसे प्यार में एकबार धोखा हो चुका था। दूसरा अवसर उसके शब्दकोश मे नहीं था। निशा ने बड़ी दृढतापूर्वक रोहित को बता दिया कि अब कभी उसे उसकी मौत की खबर भी पता लगे तो झूठे आंसू बहाने के लिए भी दो शब्द बोलने का हक नही है…।

✍️©®” जोया” 15/12/2018

जिद्द

फरवरी माह 1998 की एक शाम सुकृति अपनी डयूटी से घर लौटती है और पति के आने के इंतज़ार में शाम की चाय की तैयारी शुरू करती है।शाम से रात हो जाती है लेकिन पति राजीव का कोई अता पता नहीं चलता।किसी अनहोनी की आंशका से वह कांप उठती है। रात 11 बजे फोन की घंटी बजती है और एक सख्त आवाज का संदेश आता है कि आपके पति को उसके वसूलों की सज़ा हमने दे दी है। राजीव बहुत मिलनसार व्यक्ति थे और सुकृति को समझ नहीं आया कि मामला क्या है।सुकृति ने सुसराल वालों से सम्पर्क किया और इस घटनाक्रम के बारे मे बताया।सुकृति और राजीव बच्चों के साथ शहर में रहते थे और सास ससुर दूसरे बेटे के साथ गांव की जमीन जायदाद सम्भालते थे। सुकृति के बच्चे उस वक्त पांचवी और सातवीं कक्षा में पढते थे। राजीव से कोई सम्पर्क नहीं स्थापित हो रहा था। सुकृति की हालत बहुत खराब हो गई थी क्योंकि वह कुछ दिन पहले ही अवसाद से बाहर आयी थी। घरवालों ने चारों तरफ राजीव को ढूंढने के लिए अलग अलग स्थानों पर रिश्तेदारों को भेजा लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

राजीव एक सप्ताह बाद गंगा नदी के किनारे देवप्रयाग में मिल तो गए लेकिन मानसिक संतुलन खो चुके थे।एक सप्ताह के अन्दर ही उनकी आंखों की रोशनी काफी कम हो गई थी और शरीर पर चोट के गहरे निशान थे।वे इस हालत में नहीं थे कि बता सकें कि उनकी इस प्रकार से हालत किसने की।वे खामोश हो चुके थे। घर वाले राजीव को सुकृति को सौप कर गांव वापिस लौट जाते हैं। सुकृति के भाई ने उनका मानसिक चिकित्सा करवाई लेकिन वे कभी पूर्ण रूप से ठीक नहीं हो पाये। नौकरी से त्याग पत्र दे दिया गया क्योंकि नौकरी के नाम से ही उन्हें घबराहट होती थी। बना बनाया महल ताश के पतों की तरह ढह गया। सुकृति भी गहरे अवसाद में फिर वापिस चली गई। लेकिन वह अपनी दवाओं के सहारे अपनी नौकरी पर जाती रही क्योंकि उसने ये जिद ठान ली थी सब कुछ फिर से खडा़ करना है।

जैसे संसार में होता है कष्टों में कोई आपका साथ नहीं देता है सब रिश्तेदार धीरे धीरे दूर होते चले गए। राजीव बहुत ही हिंसात्मक हो चले गए थे और सुकृति और बच्चों पर अपना गुस्सा निकालते थे। कभी कभी बिल्कुल खामोश हो जाते। एक मानसिक रुप से बिमार व्यक्ति को सम्भालना अपने आप मे बहुत बडी चुनौती होती है।और अकेली औरत को सबकुछ सम्भालना पड़े तब डगर और भी कठिन हो जाती है। सुकृति के लिये ये सब किसी युद्ध से कम नहीं था। पांच बार तो बिजली के झटके दिए गये। डाक्टरों का मानना था कि ऐसे मरीज मुश्किल ही बच पातें हैं क्योंकि सुसाइड की आंशका बनी रहती है।बच्चों को स्कूल भेजने के बाद सुकृति अपने पति को दवाई देकर अपनी नौकरी पर चली जाती। राजीव के माता पिता भी एक महीना ठहरने के बाद गांव चले गए।

सुकृति को कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा था लेकिन मां बाप के दिए हुए संस्कारों की वजह से वह गृहस्थी की गाड़ी को एक पहिए से खींचने लगी। इस कष्ट के समय मे उसके बच्चों ने भी हौंसला नहीं खोया और लगन से हर कक्षा मे बेहतर प्रदर्शन करते रहे। इस घटनाक्रम में कब सुकृति के गहरे काले बाल बुढापे की झलक लिए दस्तक देने लगे पता ही नहीं चला। बीस साल तक जूझने के बाद सुकृति आज पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है क्योंकि उसकी मेहनत सफल हुई थी और राजीव काफी हद तक ठीक हो चले थे यद्यपि पूर्ण रूप से ठीक होंगे इसकी आशंका बनी रहती है।

आज़ सुकृति के बच्चे सुन्दर युवा बन चुके हैं और अच्छे पदों पर आसीन हैं। जो रिश्तेदार और राजीव के दोस्त दूर हो चुके थे वे अब फिर से आने लगें हैं लेकिन अब राजीव एक औपचारिकता भर निभाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कष्ट में सुकृति की बहनों और मायके वालों ने ही हौंसला अफजाई की थी। लेकिन फिर भी सुकृति ने किसी से भी एक पैसे की मदद नही ली क्योंकि उसका भगवान हर क्षण उसके साथ खडा़ था। और ये भगवान और कोई नही उसकी हिम्मत थी, उसकी जिद थी ।कहा भी जाता है कि भगवान उसकी मदद करते हैं जो अपनी मदद खुद करतें हैं। युद्ध हम केवल सरहदों पर ही नहीं करते , गृहस्थ जीवन भी मनुष्य के जीवट को अपनी कसोटी पर आंकता रहता है।

✍️©®”जोया” 20/09/2018

अटूट मौन

शब्द बयां नहीं कर सकते उस प्रेम को जो सुरभि और शंशाक एक दूसरे के लिए महसूस करते आ रहे थे जब से दोनों ने बचपन की दहलीज़ पार कर युवावस्था में कदम रखा था। पिछले बारह वर्षों से दोनो एक दूसरे की कदम दर कदम शिक्षा औरखेलजगतकी उपलब्धियों के साक्षी रहे थे। व्यवहार कुशल होने के साथ साथ शिक्षकों के प्रिय विद्धार्थीओं की श्रेणी में दोनों ने नाम दर्ज करवा रखा था।

भाषण प्रतियोगिता हो या नाटक मंचन, हमनें हमेशा दोनों को साथ साथ हिस्सा लेते देखा था। संस्कृत के नाटक शुंकतला में जिस ढंग से दोनों ने दुष्यंत और शुंकतला के चरित्र को चरितार्थ किया उसका पूरे आडिटोरियम में बैठी सभा ने करतल ध्वनिसे स्वागत किया। दोनों ने अपने प्रेम के अटूट मौन को मंच पर अभिनीत करके सबका आशिर्वाद जैसे प्राप्त कर लिया था। कभी भी हमने सुरभि और शंशाक के रोम रोम में बसते प्रेम को शब्दों की बैसाखी पर चलते नहीं देखा। एक दूसरे के पास से गुज़रते हुए उनका अंग अंग प्रेम के संप्नदन को इन्द्रधनुषी जामा पहना जाता था। कभी भी हमने उन्हें किसी भी तरहं की हलकी मस्ती में नहीं पाया। उन दोनों के प्रेम का पूरा बोर्डिंग परिसर साक्षी था। लेकिन क्या मज़ाल कोई किसी तरह की उंगली उठा सके। प्रेम के सागर में डूबकी लगाते हुए भी एक निश्चित दूरी बनाकर रखना व प्रेम के अहसास को नया आयाम देना दोनों के चरित्र की सुदृढ़ता को इंगित करता था।

सुरभि और शंशाक मेरे परम मित्र रह थे बोर्डिंग स्कूल में जहां हमने पहली कक्षा से अपनी जीवन यात्रा शिक्षा जगत के पायदान पर एक साथ शुरू की थी। निश्चित रूप से हम सबकी आपस में एक ऐसी समझ विकसित हुई थी जिसकी खूशबू आज साठ बरस की उम्र में भी भावनाओं से अभिभूत कर जाती है। ये कथनाक 1980 के दशक का है जब प्रेम आज़ की तरह बात बात पर दम नहीं तोड़ता था। उस प्रेम में समुंद्र सी गहराई और आसमान सी ऊंचाई थी जो परंम्पराओ में बंधे होने के बावजूद इश्क की नयी कहानी गढ़ गया था। जिसमें अलगाव भी हुआ, रास्ते भी बदले, अलग अलग गृहस्थी भी बसी लेकिन प्यार ने दम नहीं तोड़ा।

सुरभि और शंशाक अपने परिवार की सीमाओं में बंधे हुए, माता पिता की समझ के हवन में अपने प्रेम की आहुति डालकर कर्तव्य के सज़ग परहरी बने और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर अपनी राहों पर पीड़ा मिश्रित आंनद की अनूभूति के साथ गृहस्थीकी डगर चल पड़े। सालों तक अपने जीवन में व्यस्त हम सब साथी डिजिटल मीडिया से दुबारा संम्पर्क में आए और साथ लौट कर आए युवा अवस्था के प्रेम- किस्से। सुरभि और शंशाक आज़ भी पार्टियों में बड़ी संजदगी से एक दूसरे से अटूट मौन में रहकर उस सुरमई अहसास में खो जाते हैं जो बरसों पहले वातावरण में एक सुंगंध फैलाता था। आज़ भी कभी उन्होंने अपनेप्यार को शब्दों में नहीं पिरोया। बस दोनों के साथ होने की सुखद अनूभूति मात्र ही हमारी पार्टियों में नयी खुशबू बिखेर जाती है। हम सबके बीच सुरभि और शंशाक इश्क का वो दरिया हैं जिसमें हम बचपन के साथी प्रेम के मोती चुनने का अधूरा प्रयासकरते हैं।

✍️© “जोया” 09/10/2018