Monthly Archives: October 2018

रुह की जमीन

रूह की जमीन पर
रखा जो उसने कदम
क्षण में ही बन गए वो मेरे हमदम।

दिल की पंतग उड़ चली
लिए सपनो की डोर
सुंगधा समीर बही यौवन के भोर।

इश्क लेता रहा अंगड़ाई
मिलकर जीवन किताब जब रचाई
विधाता की कलम भी लड़खड़ाई।

सह्रत्र शूलों की पगडंडी
अफवाहों की सज़ी थी मंडी
रूह से रूह की तपन कभी ना पड़ी ठंडी।

भूगौलिक दूरी
शारिरिक प्रेम की मजबूरी
रूह की जमीन पर सजती संवरती हर वक्त नूरी।

संकीर्ण मानसिकता के घेरे से दूर
इश्क के पुष्प गुच्छ खिले सुदूर
फैली सुंगध दूर दूर तक भरपूर।

बंधनों के कौड़े
रसमय जीवन को निचौड़े
डरपोक यहां पर होते भगौड़े।

रूह की जमीं पर सज़ाया
इश्क ने जब आशियां
महक उठी अंतर्मन की वादियां।

अवचेतन मन ने भी किया सोलह श्रृंगार
रूह की जमीं पर जब हृदय वीणा ने की झंकार।

✍️© “जोया” 23/10/2018

Advertisements

प्रेम के हस्ताक्षर

काया उम्र दराज़ हो चली
झुर्रियां भी अब लगें भली।

जिन्दगी ने लिए खूब इम्तिहान
कुछ सपने नहीं चढ़े परवान।

उगता सूरज़ भी डूबा
शेष नहीं अब कोई मनसूबा।

जीवन एक रंगमंच
रचे जाते अनेकों परपंच।

रिश्ते नातों का खज़ाना
छूटा जाए, यही अब फस़ाना।

मिट्टी के हम सब दीए
जलते रहे जब तक जीए।

एकांत के मौन में
टिमटिमाते जुगनू से क्षणों में।

इश्क था सबसे बेखबर
माशूक दिलों की स्वप्निली डगर।

जीवन की सांझ में
भी गया मुस्करा
प्रीत की डोली उठा
रच गया प्रेम हस्ताक्षर।

© ✍️” जोया” 17/10/2018

तुम दागते रहे वाणी के तीर
वह बहाती रही आंखों से नीर।

वार त्यौहार में भी ना कभी सजी
वह रहती नित बुझी बुझी।

तुम बन न पाए उसके हृदय के साज़न
वह फिर भी बनी तुलसी तेरे आंगन।

वफाओं पर उसकी तुमने न लगाई मुहर
फिर भी वह निभाती रही गृहस्थी का शऊर।

तुम बांटते रहे अपनो में रेवड़ियां
जकड़ते रहे उसके पांव में बेड़ियां।

उसके शरीर पर जो चलाते रहे हंटर
फिर भी बसाया तुम्हें उसने मन मंदिर।

तुम छिड़कते रहे उसके जख्मों पर नमक
वह झेलती रही तुम्हारी पागलों सी सनक।

तुम अंहकार के नशे में रहते चूर
हर पल निकालते उसी का कसूर।

थक चुकी थी वह झुकते झुकते
मंजिल उसने फिर हासिल की लिखते पढ़ते।

हिम्मत से वह बढा़ती रही छोटे छोटे कदम
रफू करती रही अवचेतन पर अंकित जख्म।

वाणी में उसकी अब आत्मविश्वास झलका
नूर भी चहेरे पर बरसने लगा हल्का हल्का।

क्षैत्र की हुनरमंद महिलाओं को किया इकट्ठा
धीरे धीरे साहस का अंकुर उन में भी फूटा।

स्वयं सहायता समूह बनाया
अपने कौशल का झंडा फहराया।

सरकारी सहायता भी समूह को मिलने लगी
नारी गरीमा फिर से फलने फूलने लगी।

✍️©️”जोया” 16/10/2018

मन के दीए

इस बार दिवाली कुछ नये ढंग से मनाए
कुम्हार के परिवार द्वारा बनाए दीए जलाएं।

खूब सजाएं अपने घरों को, लेकिन
देशी शिल्पकारों की कृति ही घर लाएं।

खादी को घर घर अपनाएं
अपने बुनकरों का मान बढ़ाएं।

मिठाईयों को त्याग कर
घर की बनी हलवा पूरी खाएं।

जब भी हम लक्ष्मी जी को भोग लगाएं
अन्न व दीप दान अनाथ आश्रम में भी कर आएं।

इस बार दिवाली कुछ नये ढंग से मनाए
कुम्हार के परिवार द्वारा बनाए दीए जलाएं।

दीपवाली की बधाई में हृदय की मिठास मिलाएं
आओ इस बार दिवाली पर बुजुर्गों से आशिष ले आएं।

मंदिरों में जब दीए जलाएं
मन के अंधकार को वहीं छोड़ आएं।

अबकी बार जब हम दिवाली मनाएं
एक दीया पूर्वजों के नाम का भी जलाएं।

इस बार दिवाली कुछ नये ढंग से मनाएं
कुम्हार के परिवार द्वारा बनाए दीए जलाएं।

कन्या भ्रूण हत्या, नारी अपमान सरीखी कुरीतियों को भगाएं
सब मिलकर बेटियों को पढ़ाएं व बेटों को भी संस्कारी बनाए।

इस बार दिवाली नये ढंग से मनाएं
गरीब की झोंपडी में भी दीए जलाएं।

आडंबरों से रहित जीवनशैली अपनाएं
इस दिवाली पर सब मन के दिए जलाएं।

इस बार दिवाली कुछ नये ढंग से मनाएं
कुम्हार के परिवार द्वारा बनाए दीए जलाएं।

✍️©®”जोया” 14/10/2018

रीत गए

बीती सदी सा तुम रीत गए
भुलाई तुमने प्रीत
बन गए किसी के मीत
मेरे लिए अब तुम बीत गए।

दिल अपना प्रीत पराई
देखो कैसी बदली छाई
आंखे मेरी भर आयी
छलिया तूने कैसी प्रीत निभाई?

प्रीत कैसे बनी यूं हरजाई
आहों की कैसी बेला आयी
तुम्हें याद मेरी ना आई
विरह अग्नि भी शरमाई।

हमजोली मेरे तुम रीत गए
बन गए किसी के मीत
भूले साथ गुनगुनाए गीत
मेरे लिए अब तुम बीत गए।

माथे पर अंकित वो चुम्बन
दिल की बढ़ी जब धड़कन
रोम रोम में हुआ संपन्दन
कण कण में हुई थी थिरकन।

बरसे बादल सा तुम रीत गए
निभाई ना तुमने प्रीत
बन गए किसी के मीत
मेरे लिए तुम अब बीत गए।

सूखे पोखर सा तुम रीत गए
स्वप्न सुनहरे पर कठोर पहरे
होते जख्म दिन रात गहरे
प्रीत का झंडा अब ना फहरे।

शापित कूएं सा तुम रीत गए
झूठलाई तुमने प्रीत
बन गए किसी के मीत
मेरे लिए अब तुम बीत गए।

पत्र में दबा वो गुलाब का फूल
फांक रहा अब गर्दिश की धूल
क्या प्रीत बनी मेरी भूल
चुभते हैं हृदय मे कांटे और शूल।

परंम्पराओ के बंधन तोड़
संकीर्णता के दायरे छोड़
कसमें मिलकर खाई
फिर क्यों हुई प्रीत पराई?

तपते मरूस्थल सा तुम रीत गए
टूटी बंधन की डोर
छा गया अंधेरा यौवन के भोर
मेरे लिए तुम अब बीत गए।

सूखे झरने सा तुम रीत गए
उड़ गया पंछी चकोर
चुग कर जीवन का पोर पोर
नहीं मचाया प्रीत ने शोर।

मिलन की बेला का सतरंगी धनुष
प्रेम रंगों से सज़ाया दिल फानूस
संग गाए गीत बने नासूर
दिल वीणा हुई काफूर।

बरसाती नदी सा तुम रीत गए
सुर सुंदरी के बने तुम मीत
आंसू बहाए मेरी प्रीत
मेरे लिए तुम अब बीत गए।

ये कैसी निभाई तुमनें प्रीत
बागों में कोयल जब कूकेगी
गाएगी तेरी बेवफाई का तराना
प्रेमी युगल ना लिखेंगे फिर कोई फ़साना।

✍️©®जोया”12/10/2018

रहबर

रहबर मेरे
ख्यालों में रहते नित नये सवेरे
पलकों की चिलमन तेरी

उठाए सपनों की डोली मेरी।

महकती हैं सांसे मेरी
चटकती बागवां की कली जब तेरी
तितलियां तुम्हारे हृदय की छेड़ती हैं तान
झंकृत कर जाती फिर मेरा सुरीला गान।

थिरकता है रोम का कण कण
कौंधती बिजलीयां जब नशेमन।

राही तुम मेरे कंटीले पथ के
सारथी मेरे जीवन रथ के
फूल मेरे हृदय उपवन के
शूल मेरे हर दुश्मन के।

मेरी जीवन रंगोली की बान तुम
मेरे चढ़ते सूरज़ की शान तुम
तुम से ही है रोशन मेरा नूरानी महल
जहां नित रहती खूब चहल पहल।

आसंमा के सितारों का
बनाया तुमने सुंदर बिछौना
उतार लाए चांद को नभ से
बनाया उसको फिर मेरा खिलौना।

तुम ही मेरे प्राण प्रिय
तुम ही मेरा सम्मान प्रिय
मैं प्यासी नदी मरूस्थल सी
तुम गहरा सागर मेरी जान प्रिय।

✍️©®”जोया” 11/10/2018

इश्क़ एक डगर

कमल की पंखुरी से खिले तुम्हारे होंठ
मृगनयनी अध खुली इश्क़ से सराबोर आंखे
मज़बूरी का सबब लिए तुम्हारा अक्स
याद़ है आज़ भी परम्पराओं सा कठोर शख्स ।

शालीनता से जुद़ा होते वे क्षण
समेटे इश्क का कण कण
लिए गहरे जख्मों की थाती
फिर लिख न पाए एक दूज़े को पाती।

रूह से रूह की होती मुलाकात हर रोज़
सागर सी गहराई लिए मधुर वाणी तेरी
झंकृत कर जाती हृदय वीणा मेरी
मन तरंगो से जुड़ना बन गई अब नयी खोज़।

डगर हमारी रही जुद़ा जुद़ा अगर
सामाजिक ताने बाने का था असर
हृदय में पल्लवीत फूलों को जो देता है मसल
आंक ना पाता समाज़ सच्चे इश्क की नस्ल।

इश्क का सुरमयी अहसास
भरता रोम रोम में उल्लास
निर्जन वन है उनका हृदय
जिसमें खिलते नहीं फूल ये खास़।

या फिर परंपरा की चादर ओढ़े
बन जाते वे जलते सूरज़ के घोड़े
होते हैं सचमुच बहुत निगोड़े
इश्के जनून पर चलाते जो जमकर हथौड़े।

इश्क की जमीं निराली
निराला इश्के आसमां
इश्क दिले बागवां की है खुशबू
मिट जाती हस्ती, पर मिटा ना सके कोई इश्क की हरियाली।

✍️©®”जोया” 10/10/2018