Monthly Archives: September 2018

बचपन

सावन की बदली
जब जब घिर- घिर कर आती है
तो न जाने क्यों
मेरे अंतर्मन पर
कुछ अनकही य़ादें
एक-एक कर उकेरी जाती हैं।

और
मैं खो जाती हूं
उस बचपन में
जब सफलता की दौड़ नहीं थी
जब पैसा कमाने की होड़ नहीं थी
जब सब जिन्दगी सहज़ भाव से जीते थे
और छल और फरेब से थे रहते सब दूर
हम बालक रहते थे जोश से भरपूर।

जहांं मिलना-जुलना ही महजब था
जहां धर्म, नस्ल व भेद की दीवारें नहीं थी
जहां जात-पात के नारे नहीं थे
जहाँ बेटी सबकी सांझा जिम्मेदारी थी
जहां गिरे हुए को उठाने में मिलता था अपूर्व सन्तोष।

कहां गया वो बचपन
कहां गए वो सितारे
कहां लुप्त हो गया बुजुर्गों का मेला
क्यों हो गया मनुष्य अकेला – अकेला
क्यों नहीं सुलझाते लोग अब किसी का भी झमेला?

कौई मुझे बतलाए जरा
क्यों हो रहे जंगल वीराने
क्यों बदल रही है बयार
क्यों उलझ रहे लोग बनकर सियार।

क्यों नहीं उतरता मनुष्य अब खरा खरा
क्यों डगमगाया चित्त ज़रा ज़रा
क्यों जल रहे अब शमा परवाने
क्यों नहीं लगाता समाज़ उतकृष्ट निशाने
क्यों सज़ते हैं अब हर घर मयखाने।

पूछता है मेरा उद्वेलित हैरान पंसेमा मन
क्यों लौटकर नहीं आ सकते दिन पुराने
जब छोटी छोटी खुशियों का खज़ाना था कण कण
जब भंवरे करते थे मधुर गुंजन
जब उड़ती थी तितलियां वन वन
जब मोर नाचते थे हर घर आंगन
जब खनखनाते थे झोली में कंचे कंचन।

आह! क्या थे वे दिन पुराने
जब बुआ आती थी लेकर देसी घी का चूरमा
खाकर हम बच्चे बन जाते थे सूरमा
जब दादा जाते थे शहर
हम बच्चे मचाते थे हुड़दंग सारी दोपहर
खूब खेलते थे गुल्ली ड़ंडा
और पिठ्ठू में अपनाते थे जीतने का फंडा।

निपटा कर स्कूल का काम
गिट्टे मिलकर खेलती थी सारी सहेलियां
कभी अंका- डंका
कभी लगंड़ी टांग
सावंन में मां उतराती थी मीठी स्वाहलीयां।

निशाना मेरा होता था सटीक
और मैं लड़कों से भी कंचे जाती थी जीत
भर लेती थी अपनी छोटी टोकनी
पिताजी जब परदेश से आते
ढूंढ निकालते थे हमारी शरारतों की निशानी
और फेंक देते थे घर की कुंई मे कंचों से भरी टोकनी
बेटी शिक्षा की लौ गांव मे उन्होंने जलाई
सब को समझाया बेटी नहीं होती पराई।

✍️©®”जोया”17/09/2018.

बधाई

प्यारी बिटिया तुम्हें मुबारक ये खुशी
जीवन तुम्हारा बीते हंसी हंसी
अपनी कर्मभूमि में रहना लीन
मेरी दुआएं,तुम कभी ना रहो दुखी या दीन।

अपनी क्षमता का लोहा तुम मनवाओ
ऊंचाई के शिखर पर चढ़ती जाओ
मुश्किलों से कभी ना घबराओ
ज्ञान की लहर पर तैरती जाओ।

हौंसलों की भरो उड़ान
हमेशा रहो सीना तान
सपनों को चढ़ाओ परवान
खूब बढ़ाओ अपना मान सम्मान।

जीवन मनुष्य का बहुत दुर्लभ
संचित करो कर्म सदभावना के नारी सुलभ
गहरे सागर सा रहे चित वल्लभ
चुन चुन लाओ मोती व शंख दुर्लभ।

चुनौतियां जीवन में आती अनेक
लेकिन कार्य करते जाना नेक
मिलेंगे अवसर तुम्हें अनेक
दुर्व्यवहार के आगे कभी ना देना घुटने टेक।

मेहनतकश व्यक्ति बन जाता कंचन
तपता, निखरता और संवरता जीवन
बाधाओं से कभी न घबराना
हिम्मत से उनसे टकरा जाना।

हर्षित, पुल्लकित रहे तुम्हारा जीवन
मां करती ईश से है वंदन
बगिया तुम्हारे हृदय की महकती रहे
बिटिया हमारी हमेशा चहकती रहे।

✍️©®”जोया”19-09-2018

राही तू चलता चल

राही तू चलता चल

लेकर सपने संग

मजिंल तूझे मिलेगी

आज नहीं तो कल।

माना कठिन है डगर

हौसला है तूझ मे अगर

बाधाएँ बन जाएंगी सीढियां

याद करेंगी आने वाली पीढियां।

समाज की आसुरी प्रवृत्तियां

और विघटनकारी शक्तियां

फैला रही हैं आंतक

समय की पुकार

करना है इनका अंत।

वर्ग, जाति और धर्मों में बटा ये देश

समाज की नींव हिल रही

धरती देती संदेश

रचयिता ने जब किया नहीं भेद

क्यों मानव मानव की छाती मे कर रहा छेद।

आरक्षण का कीड़ा

रिस्ते घावों की पीड़ा

राही उठा ये बीड़ा

हल ढूंढो ताकि मिट जाए पीड़ा।

आरक्षण ग़र देना है

दे दो आर्थिक आधारों पर

गरीब की कोई जात न होती

कौन समझाए नामदारों को।

हिमा, दुती और स्वपना

मान बढ़ाती विदेशों में

गरीब परिवारों से निकली ये धावक

देश का मान हैं, सम्मान हैं

इनको आदर्श बना कर चल

मजिंल तूझे मिलेगी

आज नहीं तो कल, राही तू चलता चल।

बहा बदलाव की बयार

नहीं माननी है तूझे हार

छोटे छोटे कदमों से तय करना है सफर

हो जा निश्छल और निडर

राही तू चलता चल।

हवाएं भी चल पड़ेगीं तेरे संग

तू चल तो सही लेकर नयी उमंग

क्षमता तेरी तू नभ नाप

कलम तेरी हिम्मत छापे

फिर काहू का डर व्यापे।

ग़र भुजाओं मे है बल

हर कोशिश होगी सफल

राही तू चलता चल

मिलेगी मजिंल तूझे

आज नही तो कल।

दृढ़ संकल्प और मनोबल से

हर प्रश्न हो जाता है हल

राही तू चलता चल

क्योंकि कभी नहीं जाती विफल।

सदभावना की माला पिरोता चल

लेकर फूलों की ताजगी संग

प्रकृति से लयबद्ध होकर चल

मजिंल तूझे मिलेगी, आज नहीं तो कल।

—-सन्तोष चाहार—04–09–2018