Monthly Archives: August 2015

मेरी कलम की स्याही

मेरी कलम की स्याही है ये

जीवन रूपी दवात में खूब डूबाई है ये

कभी लाल,कभी काली व नीली

रही है हरदम जोश की प्याली

अक्षर-अक्षर उकेरती रही है ये।

उबड-खाबड पंथ कंंटीले

नही रोक सके हैं इसको कंठ सुरीले

कह-कशे और व्यंग-बाण से

कभी नही कतराई है ये

मेरी कलम की स्याही है ये

जीवन भर की कमाई है ये।

कोटि-कोटि नमन करती आई है ये

मांं-बाप, संग-साथी और भाई को

लेकिन नहीं भूल पाई है

उन फरिश्तों को

जिन्होने की अब रूसवाई है

मेरी कलम की स्याही है ये।

निशाने पर हैं आज हैं इसके

भारत मांं को छलनी करते दरिदें

ऊंची उड़ान भरते वो परिंदे

जिनकी चोंच में अब ठिठाई है

सावधान, मेरी कलम की स्य़ाही है ये।।

नयी औरत

ओस की बूंद की तरह

स्पषट, निश्चछल व

कभी सूर्य की किरणों की तरह

कभी चांद की रोशनी से सराबोर

चमकता दमकता मेरा व्यक्तित्व।

अपने हुनर को तराशने में सज़ग

सीढ़ी दर सीढ़ी मुकाम की ओर बढ़ता

हर क्षेत्र में अपना परचम लहराता

आकाश की उंंचांंईओं को

मापता मेरा व्यक्तित्व।

तूफानो से टकराता

हमेशा संघर्षशील

परिवर्तन का साक्षी

ईश्वरीय विधान के समक्ष

झुकता मेरा व्यक्तित्व।

हर क्षण मातृभूमि को नमन कर

नयी इबारत लिखने को तत्पर

तलवार की धार पर चलता

परिस्थितियों को पैरों तले

कुचलता मेरा व्यक्तित्व।

अदभुत क्रियाशील

जोश से भरा

बच्चे, बूढे और जवान

सबसे तादम्य कर

कदम मिलाता मेरा व्यक्तित्व।

कभी हार न मानता

बाधाओं को सीढ़ियां बनाता

सच्चाई के मार्ग पर अग्रसर

सीना ताने आगे बढ़ता

मेरा चमकता दमकता व्यक्तित्व।

✍️©® ” जोया”

परी

डग़र की ओर बढ़ते कदम

ठिठक कर रूक जाते हैं

और ताकते रहते हैं

कंटीले मार्ग को।

नयन रफ़ता रफ़ता

देखते हैं चहुं ओर

कि कहीं, कोई विषधर

फन फैलाए तो नही बैठा है।

कौंधती बिजली

रूकती हृदयगति

शाम ढलने को़

है अमावस्या की अंधेरी रात

एक कली चटकती है

हवा में खुशबू महकती है

एक परी खन खन कर के

उड़न खटोले पर विराजमान

नभ से उतरती है

और अपनी जादुई छड़ी से

निकाल फैंकती है उस दंश को

जो कहीं अंतर्मन मेंं गड़ा हुआ था

और बिछ़ा देती है सुर्ख

लाल, पीले व हरे नीले फूल।

अब उठ चलते हैं

रूके हुए कदम

अपनी मंजिल की ओर

कभी ना रूकने के लिए।

जानते हो ये परी कौन है?

मेरी बेटी, मेरी लाडली

मेरी जा़न मेरा जीवन

मेरी हमसफर, मेरी राज़दार।

“जोया”

खुशी

हर खुशी हो वहां

तू जहां भी रहे

महक उठे वादीयां

तू जहां भी रहे।

हर तरफ हो वफ़ा

तू जहां भी रहे

जिन्दगी मुस्करा उठे

तू जहां भी रहे।

हर मुकाम हो हासिल

तू जिधर का रूख करे

झुक जाए आसमां

छूने तू जब लगे।

हौंसले रहें बुलन्द

तू जिस डगर चले

जिन्दगी ना हो खफा

तू जहां भी मिले।

आशिर्वादों की लग जाए झड़ी

तू जहां भी रहे

हर खुशी हो वहां

तू जहां भी रहे।

अनुभूति

जीवन एक सुन्दर अनुभूति

अपनो के पास होने की

पल – पल प्यार का अहसास

जींवत करता हुआ हर श्वास।

माटी की भीनी खशबू

अंतर्मन को सहलाती

इठलाती बल खाती

दूर तक फैली जाती।

सौंदर्य से भरपूर

महकता बचपन सूदूर

यादों के साए

सब अपने,नही कोई पराए।

जीवन की मंगल बेला

पुकाऱता जीवन का गीत सुरीला

रंगों की दुनिया का मेला

आओ गढे़ जीवन चरित्र अलबेला।

@तोषी-सन्तोष मलिक चाहार–@

My Valentine

Whose voice is that I hear?

So loud and clear

Reverberating each cell of my being

Mesmerizing, haunting, jaunting,

Firmly resounding in the air.

A Voice-

So sweet, so lucid

So enthralling, so entreating

Resounds here, there and everywhere,

Dripping to converse in a Treat…

Soft ,meek ,humble is the soul where it houses

As I know

It is the voice of my Valentine.

My Valentine is

The nucleus of each cell of my being

Which keeps the momentum, the ride and tide

And helps me to surf the waves

In the sea of vast humanity.

Lamentations

My Pa was my world
To whom I ran every time I won
Or was defeated
To seek blessings and encouragement
He now only speaks in whispers
That only my soul can hear
Snatched away as he is
From my world and
Rests in peace with
The omniscient, omnipotent and omnipresent.
But I am now in a fix
Trapped am I,
In a mesh of worldly duties
Obligations to fulfil
Bread and butter to earn,
Siblings to be nurtured
With a soul so fractured.
O! My Pa, Where are You?
Where are You?
Where are You?